सत्रहवां अध्याय ( श्रद्धात्रय विभागयोग ) इस पूरे अध्याय में श्रद्धा, आहार, यज्ञ, तप व दान के तीन – तीन प्रकारों का वर्णन किया गया है । इसलिए इस अध्याय का नाम श्रद्धात्रय रखा गया है । जिसमें श्रद्धा के साथ- साथ अन्य अंगों के भी तीन- तीन प्रकार बताये गए हैं । इसमें कुल …
सोलहवां अध्याय ( दैवासुर सम्पद् विभागयोग ) जिस प्रकार नाम से ही विदित होता है कि इस अध्याय में दैवी व आसुरी प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों के लक्षणों का वर्णन किया गया है । इसमें कुल चौबीस ( 24 ) श्लोकों के द्वारा दैवी व आसुरी शक्तियों का वर्णन किया गया है । इसमें पहले दैवी …
पन्द्रहवां अध्याय ( पुरुषोत्तम योग ) इस अध्याय में कुल बीस ( 20 ) श्लोकों का वर्णन किया गया है । जिसमें परमपद के लक्षणों का, जीवन का स्वरूप, आत्मा के ज्ञान व पुरुषोत्तम ज्ञान के स्वरूप की चर्चा की गई है । पहले उस परमपद का वर्णन करते हुए कहा गया है कि सम्मान …
चौदहवां अध्याय ( गुणत्रय विभागयोग ) इस चौदहवें अध्याय में मुख्य रूप से गुणों के विभागों ( सत्त्वगुण, रजोगुण व तमोगुण ) की चर्चा की गई है । इसमें कुल सत्ताईस ( 27 ) श्लोक कहे गए हैं । गुणों के विषय में कहा गया है कि पूरी प्रकृति इन तीन गुणों से ही निर्मित …
तेरहवां अध्याय ( क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग ) इस अध्याय में मुख्य रूप से क्षेत्र ( शरीर ) व क्षेत्रज्ञ ( आत्मा ) के स्वरूप का वर्णन कुल चौतीस ( 34 ) श्लोकों के माध्यम से किया गया है । सबसे पहले श्रीकृष्ण क्षेत्र व क्षेत्रज्ञ को समझाते हुए कहते हैं कि इस शरीर को क्षेत्र व आत्मा …
