सात्त्विक कर्ता के लक्षण मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ।। 26 ।। व्याख्या :- जो कर्ता आसक्ति और अहंकार से मुक्त होकर धैर्य तथा उत्साह के साथ कार्य की सफलता और असफलता में स्वयं को निर्विकार ( समभाव ) बनाए रखता है, उसे सात्त्विक कर्ता कहते हैं । …
सात्त्विक कर्म नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम । अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ।। 23 ।। व्याख्या :- जो कर्म शास्त्रों के अनुसार आसक्ति, राग, द्वेष व फल की इच्छा से रहित होकर किया जाता है, वह सात्त्विक कर्म कहलाता है । राजसिक कर्म यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः । क्रियते …
सांख्य दर्शन के गुण = सत्त्व, रज व तम ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः । प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छ्णु तान्यपि ।। 19 ।। व्याख्या :- गुणों ( सत्त्व, रज व तम ) की संख्या पर आधारित सांख्यशास्त्र ( सांख्य दर्शन ) के अनुसार ज्ञान, कर्म और कर्ता सात्त्विक, राजसिक …
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः । न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ।। 15 ।। व्याख्या :- मनुष्य अपने मन, वचन व शरीर से जो भी कर्म करता है, फिर चाहे वह न्याय संगत ( शास्त्रों द्वारा उपदेशित ) हों अथवा न्याय विरोधी ( शास्त्रों द्वारा वर्जित ) उन सभी कर्मों के यही पाँच …
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ।। 11 ।। व्याख्या :- कोई भी शरीरधारी ( मनुष्य ) चाहते हुए भी सभी कर्मों का बिल्कुल त्याग नहीं कर सकता । अतः जो नियत कर्मों का त्याग न करके कर्मफल की इच्छा का त्याग करता है, वही सच्चा त्यागी होता …
