एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः । अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ।। 16 ।।     व्याख्या :-  हे पार्थ ! जो मनुष्य इस सृष्टि के कर्म चक्र के अनुसार नहीं चलता अथवा इस कर्म चक्र को विधिवत रूप से आगे नहीं बढ़ाता है, बल्कि स्वयं ही सभी भोगों को भोगता रहता है, ऐसे मनुष्य

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Bhagwad Geeta Ch. 3 [16-19]

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः । तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः ।। 12 ।।     व्याख्या :-  यज्ञ के द्वारा पुष्ट अथवा सशक्त हुए देवता बिना मांगे ही तुम्हारे सभी इच्छित ( जिसको प्राप्त करने की इच्छा होती है ) भोग तुम्हें प्रदान करते रहेंगे । जो मनुष्य उन देवताओं द्वारा प्रदान किये

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Bhagwad Geeta Ch. 3 [12-15]

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधनः । तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर ।। 9 ।।     व्याख्या :- मोक्ष अथवा मुक्ति के बीच में यह कर्म ( आसक्ति युक्त ) ही बहुत बड़ी बाधा बना हुआ है । जब व्यक्ति कर्म व उसके फल में आसक्ति कर लेता है तो वह कर्म बन्धन पैदा करता है ।

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Bhagwad Geeta Ch. 3 [9-11]

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्‌ । इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ।। 6 ।।     व्याख्या :-  जो मनुष्य अपनी कर्मेन्द्रियों ( हाथ- पैर आदि ) से विषयों ( इच्छाओं ) का त्याग कर देते हैं और मन ही मन उन सभी विषयों का चिन्तन- मनन करते रहते हैं । उन्हें इन्द्रियों के विषयों

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Bhagwad Geeta Ch. 3 [6-8]

श्रीभगवानुवाच लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ । ज्ञानयोगेन साङ्‍ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्‌ ।। 3 ।।     व्याख्या :-  भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि हे निष्पाप अर्जुन ! इस संसार में दो प्रकार की निष्ठायें होती हैं । जिनका वर्णन मैं पहले ही ( दूसरे अध्याय में ) कर चुका हूँ । इनमें सांख्य- योगियों के

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Bhagwad Geeta Ch. 3 [3-5]