साङ्‍ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः । एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्‌ ।। 4 ।।     व्याख्या :-   कुछ मूर्ख अथवा अज्ञानी व्यक्ति सांख्ययोग व कर्मयोग को अलग- अलग मानने की भूल करते हैं, लेकिन पण्डित अथवा विद्वान पुरुष ऐसा नहीं मानते । बल्कि विद्वानों का कहना है कि इनमें से ( सांख्ययोग व कर्मयोग में से

Read More
Bhagwad Geeta Ch. 5 [4-6]

पाँचवा अध्याय ( कर्म सन्यासयोग ) इस अध्याय में मुख्य रूप से कर्मयोग व कर्मसन्यास योग की चर्चा की गई है । इसमें कुल उन्नतीस ( 29 ) श्लोकों का वर्णन है । इस अध्याय में कर्मयोग व सांख्ययोग को एक ही प्रकार का योग बताया है । जब अर्जुन पूछते हैं कि कर्मयोग व

Read More
Bhagwad Geeta Ch. 5 [1-3]

योगसन्नयस्तकर्माणं ज्ञानसञ्न्निसंशयम्‌ । आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।। 41 ।।     व्याख्या :-  हे धनंजय ! जिस मनुष्य ने योग द्वारा अपने सभी कर्मों का व ज्ञान द्वारा सभी संशयों को दूर ( त्याग ) कर दिया है, उस आत्मज्ञानी पुरूष को कर्मबन्धन कभी नहीं बाँधते ।        तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः

Read More
Bhagwad Geeta Ch. 4 [41-42]

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः । सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ।। 36 ।।     व्याख्या :-  यदि तुम सभी पाप करने वाले पापियों से भी ज्यादा पापी हो, तो भी यह ज्ञानयोग रूपी नौका तुम्हें सभी पापों से पार लगा देगी, जिसके बाद तुम्हारा जीवन साधु अथवा सन्यासी की तरह हो जाएगा ।  

Read More
Bhagwad Geeta Ch. 4 [36-40]

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्‌ । नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ।। 31 ।।     व्याख्या :-  हे कुरुवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! यज्ञ से बचा हुआ अवशेष अर्थात् यज्ञ के बाद बचे हुए पदार्थों का सेवन करना अमृत के समान होता है, ऐसा करने वाले साधक उस सनातन परमात्मा को प्राप्त कर लेते हैं ।

Read More
Bhagwad Geeta Ch. 4 [31-35]