जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः । शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ।। 7 ।। व्याख्या :- जिसने अपनी आत्मा को जीत कर परम शान्ति को प्राप्त कर लिया है, वह योगी शीत- उष्ण ( सर्दी- गर्मी ), सुख- दुःख व मान – अपमान आदि द्वन्द्वों में भी स्वयं को समाहित अर्थात् अपने चित्त को समभाव की …
विषयों व कर्मफल की आसक्ति का त्याग = योग सिद्धि यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते ।। 4 ।। व्याख्या :- जब साधक इन्द्रियों के विषयों व कर्मफल की आसक्ति का त्याग कर देता है, तब वह सभी कामनाओं अथवा इच्छाओं का त्याग करने वाला साधक योगारूढ़ अर्थात् योगी …
छठा अध्याय ( आत्मसंयम योग ) इस अध्याय में योग में सहायता प्रदान करने वाले कारकों का वर्णन करते हुए कहा है कि मनुष्य स्वयं ही अपनी आत्मा का मित्र व शत्रु होता है । व्यक्ति को सदैव अपनी आत्मा का उत्थान करना चाहिए । इसके लिए उसे अपनी इन्द्रियों को उनके विषयों से विमुख …
ध्यान योग वर्णन स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः । प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ।। 27 ।। यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायणः । विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः ।। 28 ।। व्याख्या :- जिसने अपनी इन्द्रियों को बाह्य विषयों से हटाकर, दृष्टि को दोनों भौहों ( आज्ञा चक्र में ) के बीच में लगाकर, अपने प्राण ( अन्दर जाने …
मोक्ष प्राप्ति योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः । स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ।। 24 ।। व्याख्या :- जो व्यक्ति अन्तरात्मा में सुखी होकर, अपने आप में ही आराम अथवा शान्ति को प्राप्त कर लेता है और जिसकी अंतर्ज्योति प्रकाशित हो जाती है, ऐसा योगी ब्रह्मा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण अर्थात् मोक्ष को प्राप्त हो जाता …
