योग की परिभाषा   तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम् । स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ।। 23 ।।     व्याख्या :-  दुःख के संयोग से रहित अर्थात् सुख स्वरूप अवस्था को ही योग कहा जाता  है । योगी साधक को इस योग का अभ्यास उत्साहित मन व पूर्ण निश्चय अथवा मनोयोग के साथ करना चाहिए ।

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Bhagwad Geeta Ch. 6 [23-26]

यथा दीपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ।। 19 ।।     व्याख्या :-  जिस प्रकार वायुरहित ( जहाँ पर वायु का आवागमन न हो ) स्थान पर रखे हुए दीपक की ज्योति अर्थात् लौ निश्चल अर्थात् स्थिर होती है, वैसी ही निश्चल अथवा स्थिर अवस्था संयमित चित्त वाले योगी साधक

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Bhagwad Geeta Ch. 6 [19-22]

योगी का आहार – विहार कैसा हो ?   नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः । न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ।। 16 ।। युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ।। 17 ।। यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते । निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा ।। 18 ।।       व्याख्या :-   हे अर्जुन ! यह

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Bhagwad Geeta Ch. 6 [16-18]

आसन की स्थिर स्थिति   समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्‌ ।। 13 ।। प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ।। 14 ।।       व्याख्या :-  अपने शरीर को आसन में स्थिर करके, कमर ( पीठ ), गर्दन व सिर को बिलकुल सीधी रखते हुए, अपनी

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Bhagwad Geeta Ch. 6 [13-15]

ध्यानयोग की विधि   योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः । एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ।। 10 ।।     व्याख्या :-  योगी पुरुष द्वारा एकान्त स्थान में बैठकर मन और इन्द्रियों को अपने वश में करना चाहिए और अनावश्यक विचार व वस्तुओं को त्यागकर अपने चित्त को आत्मा में लगाते हुए निरन्तर उसका ध्यान करना चाहिए

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Bhagwad Geeta Ch. 6 [10-12]