पन्द्रहवां अध्याय ( पुरुषोत्तम योग ) इस अध्याय में कुल बीस ( 20 ) श्लोकों का वर्णन किया गया है । जिसमें परमपद के लक्षणों का, जीवन का स्वरूप, आत्मा के ज्ञान व पुरुषोत्तम ज्ञान के स्वरूप की चर्चा की गई है । पहले उस परमपद का वर्णन करते हुए कहा गया है कि सम्मान …
शुक्ल कृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते । एकया यात्यनावृत्ति मन्ययावर्तते पुनः ।। 26 ।। व्याख्या :- मृत्यु के बाद परलोक जाने हेतु शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष को नित्य व स्थायी मार्ग माना गया है । इनमें से एक मार्ग ( शुक्ल पक्ष ) में गया हुआ योगी अर्थात् शुक्ल पक्ष में …
पुनर्जन्म अथवा बन्धन का काल – कृष्ण पक्ष धूमो रात्रिस्तथा कृष्ण षण्मासा दक्षिणायनम् । तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ।। 25 ।। व्याख्या :- धुआँ, रात्रि ( अँधेरा ), कृष्ण पक्ष और दक्षिणायन के छः महीनों के समय मरने वाले योगी चन्द्रमा के प्रकाश को प्राप्त करके अर्थात् अपने शुभ कर्मों के …
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया । यस्यान्तः स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ।। 22 ।। विशेष :- हे पार्थ ! जिसमें सभी प्राणी और यह सम्पूर्ण जगत् समाया हुआ है, अर्थात् जो सभी प्राणियों और जगत् का आधार है, उस परमपुरुष परमात्मा को केवल अनन्य भक्ति भाव से ही प्राप्त किया …
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे । रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ।। 18 ।। विशेष :- जब ब्रह्मा का दिन प्रारम्भ होता है, तब यह सभी व्यक्त ( दिखाई देने वाले ) पदार्थ उस अव्यक्त ( प्रकृति ) से ही उत्पन्न होते हैं और रात्रि के समय पहले की भाँति सभी व्यक्त पदार्थ जो अव्यक्त से उत्पन्न …
