भगवान की शरण में   मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ।। 65 ।।     व्याख्या :-  तुम अपने मन को मुझमें लगाकर मेरे भक्त बन जाओ और मुझे नमस्कार करते हुए मेरी ही उपासना करो । मैं इस बात की सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ कि ऐसा

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Bhagwad Geeta Ch. 18 [65-67]

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत । तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्‌ ।। 62 ।।     व्याख्या :-  इसलिए हे भारत ! तुम अपने सभी भावों को परमात्मा में समर्पित करके उनकी शरण में जाओ, क्योंकि परमात्मा के आशीर्वाद रूपी प्रसाद से ही तुम्हें परम शान्ति व स्थान की स्थायी रूप से प्राप्ति होगी ।

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Bhagwad Geeta Ch. 18 [62-64]

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि । अथ चेत्वमहाङ्‍कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ।। 58 ।।       व्याख्या :-  सदा मुझमें ही चित्त लगाने वाला भक्त मेरे प्रसाद ( कृपा पात्र ) से ही जीवन के सभी संकटों पर विजय प्राप्त कर लेता है और यदि वह अहंकार के वशीभूत होकर मेरे वचनों को नहीं सुनता, तो वह

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Bhagwad Geeta Ch. 18 [58-61]

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति । समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्‌ ।। 54 ।।     व्याख्या :-  वह ब्रह्मभूत ( ब्रह्मभाव को प्राप्त ) प्रसन्न चित्त व्यक्ति न ही तो किसी प्रकार की चिन्ता करता है और न ही किसी प्रकार की कोई इच्छा अथवा कामना करता है । सभी प्राणियों के

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Bhagwad Geeta Ch. 18 [54-57]

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे । समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ।। 50 ।।     व्याख्या :-  हे कौन्तेय ! मनुष्य इस निष्काम कर्म नामक श्रेष्ठ सिद्धि को प्राप्त करके, किस प्रकार ज्ञानयोग की पराकाष्ठा द्वारा ब्रह्म को प्राप्त करते हैं ? उस विधि को तुम मुझसे सार रूप में जान

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Bhagwad Geeta Ch. 18 [50-53]