समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् । न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ।। 28 ।। व्याख्या :- जो मनुष्य उस अविनाशी परमेश्वर को सभी प्राणियों में समान रूप से स्थित देखकर अपनी आत्मा में हीन – भावना नहीं आने देता, वह निश्चित रूप से परमगति को प्राप्त होता है । प्रकृति …
ध्यानयोग, सांख्ययोग व कर्मयोग द्वारा आत्मा का प्रत्यक्षीकरण ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना । अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ।। 24 ।। व्याख्या :- कुछ लोग ध्यानयोग द्वारा अपने आप में ही अपनी आत्मा को देखते हैं, तो कुछ अन्य लोग सांख्ययोग और कर्मयोग द्वारा इस आत्मतत्त्व को देखते हैं । विशेष …
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते । पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ।। 20 ।। व्याख्या :- कार्य तथा करण अर्थात् शरीर तथा इन्द्रियों के उत्पन्न होने का हेतु अर्थात् कारण प्रकृति है और सुख- दुःख को भोगने का हेतु अर्थात् कारण यह पुरुष अर्थात् आत्मा होता है । विशेष :- कार्य तथा करण का …
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् । भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ।। 16 ।। व्याख्या :- सभी प्राणियों में उसकी उपस्थिति होने से वह अविभक्त ( जिसके अन्य भाग न हो सके ) होते हुए भी विभक्त है, सभी प्राणियों को उत्पन्न भी वही करता है और सभी को नष्ट …
ज्ञेय क्या है ? ( जानने योग्य कौन है ? ) ज्ञेयं यत्तत्वप्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते । अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ।। 12 ।। व्याख्या :- जो जानने योग्य परब्रह्मा है, जिसको जानने से मनुष्य को उस परमानन्दस्वरूप मोक्ष की प्राप्ति होती है, अब मैं सत् और असत् से परे उस अनादि स्वरूप के …
