समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्‌ । न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्‌ ।। 28 ।।       व्याख्या :-  जो मनुष्य उस अविनाशी परमेश्वर को सभी प्राणियों में समान रूप से स्थित देखकर अपनी आत्मा में हीन – भावना नहीं आने देता, वह निश्चित रूप से परमगति को प्राप्त होता है ।     प्रकृति

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Bhagwad Geeta Ch. 13 [28-31]

ध्यानयोग, सांख्ययोग व कर्मयोग द्वारा आत्मा का प्रत्यक्षीकरण   ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना । अन्ये साङ्‍ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ।। 24 ।।     व्याख्या :-  कुछ लोग ध्यानयोग द्वारा अपने आप में ही अपनी आत्मा को देखते हैं, तो कुछ अन्य लोग सांख्ययोग और कर्मयोग द्वारा इस आत्मतत्त्व को देखते हैं ।     विशेष

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Bhagwad Geeta Ch. 13 [24-27]

कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते । पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ।। 20 ।।     व्याख्या :-  कार्य तथा करण अर्थात् शरीर तथा इन्द्रियों के उत्पन्न होने का हेतु अर्थात् कारण प्रकृति है और सुख- दुःख को भोगने का हेतु अर्थात् कारण यह पुरुष अर्थात् आत्मा होता है ।     विशेष :- कार्य तथा करण का

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Bhagwad Geeta Ch. 13 [20-23]

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्‌ । भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ।। 16 ।।       व्याख्या :-  सभी प्राणियों में उसकी उपस्थिति होने से वह अविभक्त ( जिसके अन्य भाग न हो सके ) होते हुए भी विभक्त है, सभी प्राणियों को उत्पन्न भी वही करता है और सभी को नष्ट

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Bhagwad Geeta Ch. 13 [16-19]

ज्ञेय क्या है ? ( जानने योग्य कौन है ? )   ज्ञेयं यत्तत्वप्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते । अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ।। 12 ।।     व्याख्या :-  जो जानने योग्य परब्रह्मा है, जिसको जानने से मनुष्य को उस परमानन्दस्वरूप मोक्ष की प्राप्ति होती है, अब मैं सत् और असत् से परे उस अनादि स्वरूप के

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Bhagwad Geeta Ch. 13 [12-15]