सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म  तत्संयमादपरान्तज्ञानमरिष्टेभ्यो वा ।।  22 ।।   शब्दार्थ :- सोपक्रमम् ( शीघ्र ही परिणाम या फल देने वाले कार्य ) च ( और ) निरूपक्रमम् ( देरी से परिणाम या फल देने वाले कार्य ) कर्म ( दो प्रकार के कार्य होते हैं ) तत् ( उन कर्मों में ) संयमात् (

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Yoga Sutra 3 – 22

मैत्र्यादिषु बलानि ।।  23 ।।   शब्दार्थ :- मैत्री ( मित्रता ) आदिषु ( आदि भावनाओं में संयम करने से ) बलानि ( बल की प्राप्ति होती है )   सूत्रार्थ :- मित्रता आदि चित्त प्रसादन के उपायों में संयम करने से योगी को मित्रता आदि विषयों में बल की प्राप्ति होती है ।  

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Yoga Sutra 3 – 23

बलेषु हस्तिबलादीनि ।।  24 ।।   शब्दार्थ :- बलेषु ( अलग- अलग प्रकार के बलों में संयम करने से ) हस्तिबलादीनि ( हस्ति अर्थात हाथी आदि के बल की तरह ही अलग- अलग प्रकार के बलों की प्राप्ति होती है )     सूत्रार्थ :- अलग- अलग प्रकार के बलों में संयम करने से योगी

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Yoga Sutra 3 – 24

प्रवृत्त्यालोकन्यासात् सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम् ।। 25 ।। शब्दार्थ :- प्रवृति ( मन की प्रवृत्ति अर्थात मन की सत्त्व गुण प्रधान अवस्था ) आलोक ( प्रकाश का ) न्यासात् ( प्रभाव पड़ने या उसमें संयम करने से ) सूक्ष्म ( महीन अर्थात जो सामान्य रूप से न दिखाई दे ) व्यवहित ( जो किसी आवरण अर्थात पर्दे के

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Yoga Sutra 3 – 25

भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात्  ।। 26 ।।   शब्दार्थ :- सूर्ये ( सूर्य में ) संयमात् ( संयम करने से ) भुवन ( लोक – लोकान्तरों का ) ज्ञानम् ( ज्ञान हो जाता है )   सूत्रार्थ :- सूर्य में संयम करने से योगी को सभी लोक – लोकान्तरों अर्थात सभी चौदह भुवनों ( लोकों )

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Yoga Sutra 3 – 26

चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम् ।। 27 ।।   शब्दार्थ :- चन्द्रे ( चन्द्रमा अथवा चाँद में संयम करने से ) तारा ( सभी तारों की ) व्यूह ( स्थिति अथवा जगह का ) ज्ञानम् ( ज्ञान हो जाता है )   सूत्रार्थ :- चन्द्रमा अथवा चाँद में संयम करने से सभी तारों की स्थिति की जानकारी हो जाती

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Yoga Sutra 3 – 27

ध्रुवे तद्गतिज्ञानम् ।। 28 ।।   शब्दार्थ :- ध्रुवे ( ध्रुव तारे में संयम करने से ) तद् ( उन सभी अन्यों की ) गति ( गति अर्थात उनकी चाल का ) ज्ञानम् ( ज्ञान हो जाता है )    सूत्रार्थ :- ध्रुव तारे में संयम करने से अन्य सभी तारों की गति अर्थात चाल

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Yoga Sutra 3 – 28