स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ।। 43 ।। शब्दार्थ :- स्मृतिपरिशुद्धौ, ( स्मृति अर्थात पहले भोगे गए सुख- दुःख का अनुभव पूरी तरह से समाप्त होने पर ) स्वरूपशून्या, ( अपने स्वरूप से शून्य अर्थात गौण हुई ) इव, ( जैसी ) अर्थमात्र, ( केवल अर्थ को ही ) निर्भासा, ( दिखाने वाली ) निर्वितर्का, ( …
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- Category: Samadhi Paad








