स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का ।। 43 ।।   शब्दार्थ :- स्मृतिपरिशुद्धौ, ( स्मृति अर्थात पहले भोगे गए सुख- दुःख का अनुभव पूरी तरह से समाप्त होने पर ) स्वरूपशून्या, ( अपने स्वरूप से शून्य अर्थात गौण हुई ) इव, ( जैसी ) अर्थमात्र, ( केवल अर्थ को ही ) निर्भासा, ( दिखाने वाली ) निर्वितर्का, (

Read More
Yoga Sutra – 43

एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता ।। 44 ।।   शब्दार्थ :- एतयैव, ( इसी से अर्थात सवितर्क व निर्वितर्क समापत्तियों से ही ) सूक्ष्मविषया ( सूक्ष्म पदार्थों में की जाने वाली को ) सविचारा, ( सविचार ) च, ( और )  निर्विचारा, ( निर्विचार ) व्याख्याता, ( की व्याख्या हुई अर्थात वर्णन हुआ समझना

Read More
Yoga Sutra – 44

सूक्ष्म विषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम् ।। 45 ।।   शब्दार्थ :- च, ( और ) सूक्ष्म विषयत्वम्, ( सूक्ष्म विषयों की सूक्ष्मता ) अलिङ्ग, ( प्रकृति ) पर्यवसानम्, ( पर्यन्त रहती है । )   सूत्रार्थ :- सूक्ष्म पदार्थों की सूक्ष्मता प्रकृति पर्यन्त रहती है ।   व्याख्या :- इस सूत्र में सूक्ष्म विषयों सूक्ष्मता की अवधि

Read More
Yoga Sutra – 45

ता एव सबीज: समाधि: ।। 46 ।।   शब्दार्थ :- ता एव, ( वे सभी समापत्तियाँ अर्थात सवितर्क, निर्वितर्क, सविचारा व निर्विचारा ही ) सबीज:, ( बाह्य वस्तुओं का आश्रय लेने वाली सबीज ) समाधि:, ( समाधियाँ हैं ।)   सूत्रार्थ :- बाहरी वस्तुओं ( स्थूल एवं सूक्ष्म ) का सहारा लेने वाली ये सभी

Read More
Yoga Sutra – 46

निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसाद: ।। 47 ।।    शब्दार्थ :- निर्विचार, ( निर्विचार समापत्ति में ) वैशारद्ये, ( निपुणता अर्थात निर्मलता आने से ) अध्यात्मप्रसाद:, ( अध्यात्मप्रसाद अर्थात वस्तु के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाता है । )   सूत्रार्थ :- निर्विचार समापत्ति के निरन्तर अभ्यास से साधक इसमें अत्यंत निपुण हो जाता है । जिससे अध्यात्मप्रसाद

Read More
Yoga Sutra – 47

ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ।। 48 ।।   शब्दार्थ :- तत्र, ( उस अध्यात्म प्रसाद के प्राप्त होने पर ) प्रज्ञा, ( साधक की बुद्धि ) ऋतम्भरा, ( केवल सत्य को ही ग्रहण करने वाली होती है । )   सूत्रार्थ :-  अध्यात्मप्रसाद का लाभ प्राप्त होने पर साधक की बुद्धि केवल सत्य को जानने वाली

Read More
Yoga Sutra – 48

श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ।। 49 ।।   शब्दार्थ :- श्रुत, ( श्रवण अर्थात सुनने से ) अनुमान, ( अंदाजे या अटकल से ) प्रज्ञाभ्याम्, ( उत्पन्न बुद्धि से ) अन्यविषया, ( भिन्न अथवा अलग विषय वाली ) विशेष, ( विशिष्ट ) अर्थत्वात् ( अर्थ या ज्ञान वाली होती है । )   सूत्रार्थ :- सुने हुए

Read More
Yoga Sutra – 49