क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतु: ।। 15 ।। शब्दार्थ :- क्रम ( क्रम ) अन्यत्वम् ( भिन्नता या अन्तर ) परिणाम ( फल या नतीजा ) अन्यत्वे ( भिन्नता या अन्तर ) हेतु ( कारण या वजह ) सूत्रार्थ :- क्रम की भिन्नता के कारण ही धर्मी के अलग- अलग परिणाम होते हैं । व्याख्या :- इस

Read More
Yoga Sutra 3 – 15

शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपातीधर्मी ।। 14 ।।   शब्दार्थ :- शान्त ( अतीत या भूतकाल में ) उदित ( वर्तमान में ) अव्यपदेश्य ( भविष्य में ) धर्मानुपाती ( सभी धर्मों में विद्यमान रहने वाला ) धर्मी ( वह धर्मी होता है )   सूत्रार्थ :- किसी भी पदार्थ के अतीत, वर्तमान व भविष्य धर्मों में सदा विद्यमान

Read More
Yoga Sutra 3 – 14

एतेन  भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याता: ।। 13 ।।   शब्दार्थ :- एतेन ( इनसे ) भूत ( भूतों अर्थात आकाश, वायु आदि पंच महाभूत ) इन्द्रियेषु ( इन्द्रियों अर्थात आँख, नाक आदि में ) धर्मलक्षणावस्थापरिणामा ( धर्म परिणाम, लक्षण परिणाम, व अवस्था परिणाम ) व्याख्याता ( कहे हुए मानने चाहिए )   सूत्रार्थ :- जिस प्रकार

Read More
Yoga Sutra 3 – 13

तत: पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चितस्यैकाग्रता परिणाम: ।। 12 ।।   शब्दार्थ :- तत:  ( उसके बाद ) पुनः  ( फिर से ) शान्त ( शान्त रहने वाली ) उदितौ ( उभरने या बढ़ने वाली ) तुल्य ( एक समान या एक जैसी ) प्रत्ययौ ( ज्ञान वाली अवस्था ) चित्तस्य ( चित्त की ) एकाग्रता

Read More
Yoga Sutra 3 – 12

सर्वार्थतैकाग्रतयो: क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणाम: ।। 11 ।।   शब्दार्थ :- सर्वार्थता ( चित्त का चंचल होना ) एकाग्रतयो: ( चित्त का स्थिर हो जाना ) क्षय  ( नाश होना ) उदयौ  ( विकास होना ) चित्तस्य  ( चित्त का ) समाधिपरिणाम: ( समाधि का फल है । )   सूत्रार्थ :- चित्त की चंचल अवस्था

Read More
Yoga Sutra 3 – 11