कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्ति: ।। 30 ।। शब्दार्थ :- कण्ठकूपे ( गले के नीचे गड्डेनुमा भाग में संयम करने से ) क्षुत् ( भूख ) पिपासा ( प्यास से ) निवृत्ति: ( मुक्ति मिल जाती है ) सूत्रार्थ :- कण्ठकूप में संयम करने से योगी साधनाकाल में भूख- प्यास की अनुभूति से मुक्त हो जाता है …
नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम् ।। 29 ।। शब्दार्थ :- नाभिचक्रे ( पेट के बीच में स्थित नाभि प्रदेश के अन्दर संयम करने से ) काय ( शरीर की ) व्यूह ( संरचना का ) ज्ञानम् ( ज्ञान हो जाता है ) सूत्रार्थ :- पेट के बीच में स्थित नाभि प्रदेश के मध्य में संयम करने …
ध्रुवे तद्गतिज्ञानम् ।। 28 ।। शब्दार्थ :- ध्रुवे ( ध्रुव तारे में संयम करने से ) तद् ( उन सभी अन्यों की ) गति ( गति अर्थात उनकी चाल का ) ज्ञानम् ( ज्ञान हो जाता है ) सूत्रार्थ :- ध्रुव तारे में संयम करने से अन्य सभी तारों की गति अर्थात चाल …
चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम् ।। 27 ।। शब्दार्थ :- चन्द्रे ( चन्द्रमा अथवा चाँद में संयम करने से ) तारा ( सभी तारों की ) व्यूह ( स्थिति अथवा जगह का ) ज्ञानम् ( ज्ञान हो जाता है ) सूत्रार्थ :- चन्द्रमा अथवा चाँद में संयम करने से सभी तारों की स्थिति की जानकारी हो जाती …
भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात् ।। 26 ।। शब्दार्थ :- सूर्ये ( सूर्य में ) संयमात् ( संयम करने से ) भुवन ( लोक – लोकान्तरों का ) ज्ञानम् ( ज्ञान हो जाता है ) सूत्रार्थ :- सूर्य में संयम करने से योगी को सभी लोक – लोकान्तरों अर्थात सभी चौदह भुवनों ( लोकों ) …
