सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयो: प्रत्ययाविशेषो भोग: परार्थत्वात् स्वार्थसंयमात्पुरुषज्ञानम् ।। 35 ।। शब्दार्थ :- सत्त्व ( बुद्धि और ) पुरुषयो: ( पुरुष दोनों में ) अत्यंत ( अत्यधिक या बहुत ज्यादा ) असंकीर्णयो: ( भिन्नता है ) प्रत्यय ( इन दोनों कारकों को ) अविशेष: ( भिन्न- भिन्न अर्थात अलग- अलग न मानना ) भोग: ( भोग है …
हृदये चित्तसंवित् ।। 34 ।। शब्दार्थ :- हृदये ( हृदय अर्थात दिल में संयम करने से ) चित्त ( चित्त के ) संवित् ( स्वरूप का ज्ञान होता है ) सूत्रार्थ :- हृदय अर्थात दिल में संयम करने से चित्त के स्वरूप का ज्ञान हो जाता है । व्याख्या :- …
प्रातिभाद् वा सर्वम् ।। 33 ।। शब्दार्थ :- वा ( या ) प्रातिभाद् ( प्रातिभ नामक ज्ञान के उत्पन्न होने से ) सर्वम् ( सभी पदार्थों अथवा सिद्धियों का ज्ञान हो जाता है ) सूत्रार्थ :- प्रातिभ नामक ज्ञान के उत्पन्न होने से योगी को सभी पदार्थों अथवा सिद्धियों की जानकारी प्राप्त …
मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम् ।। 32 ।। शब्दार्थ :- मूर्ध ( कपाल में स्थित मूर्ध की ) ज्योतिषि ( ज्योति अथवा प्रकाश में संयम करने से ) सिद्ध ( सिद्ध महापुरुषों के ) दर्शनम् ( दर्शन अर्थात उनको देखने या जानने की क्षमता आती है ) सूत्रार्थ :- कपाल प्रदेश में स्थित मूर्ध ज्योति के …
कूर्म नाड्यां स्थैर्यम् ।। 31 ।। शब्दार्थ :- कूर्म ( कूर्म ) नाड्या ( नाड़ी में संयम करने से ) स्थैर्यम् ( स्थिरता अथवा ठहराव आता है ) सूत्रार्थ :- कूर्म नामक नाड़ी में संयम करने से योगी को स्थिरता की प्राप्ति होती है । व्याख्या :- इस सूत्र में कूर्म नाड़ी …
