तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् ।। 50 ।।   शब्दार्थ :- तद् ( तब उस सिद्धि अर्थात विशोका नामक सिद्धि से ) अपि ( भी )  वैराग्यात् ( वैराग्य हो जाने पर ) दोष ( दोष या अविद्या आदि क्लेशों के ) बीज ( बीजों का ) क्षये ( नाश होने से ) कैवल्य ( मोक्ष की

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Yoga Sutra 3 – 50

सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च ।। 49 ।।     शब्दार्थ :- सत्त्व ( बुद्धि ) पुरुष ( पुरुष अर्थात जीवात्मा को ) अन्यता ( अलग- अलग ) ख्यातिमात्रस्य ( जानने या मानने वाले का ) सर्व ( सभी ) भाव ( पदार्थों पर ) अधिष्ठातृत्वम् ( अधिकार प्राप्त हो जाता है ) च ( और

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Yoga Sutra 3 – 49

ततो मनोजवित्वं विकरण भाव: प्रधानजयश्च ।। 48 ।।   शब्दार्थ :- तत: ( उस अर्थात उस इन्द्रियों को जीतने से ) मनोजवित्वं ( शरीर की गति मन की भाँति होती है ) विकरणभाव: ( बिना शरीर के कहीं भी इन्द्रियों से कार्य करना ) च ( और ) प्रधानजय: ( प्रकृति से बने सभी भेदों

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Yoga Sutra 3 – 48

ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमाद् इन्द्रियजय: ।। 47 ।।   शब्दार्थ :- ग्रहण ( किसी को अनुभूत या महसूस करना ) स्वरूप ( कार्य या लक्षण ) अस्मिता ( सूक्ष्म अवस्था ) अन्वय ( सत्त्व, रज व तम से निर्मित सूक्ष्मतर अवस्था ) अर्थवत्त्व ( उद्देश्य अथवा प्रयोजन ) संयमाद् ( संयम करने से ) इन्द्रिय ( इन्द्रियों पर

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Yoga Sutra 3 – 47

रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसम्पत् ।। 46 ।।   शब्दार्थ :- रूप ( सुन्दर ) लावण्य ( चमक युक्त या तेजस्वी ) बल ( बलवान अर्थात मजबूत मांशपेशियों वाला ) वज्र ( पत्थर की भाँति मजबूत या कठोर ) संहननत्वानि ( के समान संयुक्त या संगठित होना ) कायसम्पत् ( शरीर की सम्पदा अर्थात सम्पत्ति है )  

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Yoga Sutra 3 – 46