वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्त: पन्था: ।। 15 ।।   शब्दार्थ :- वस्तु ( वस्तु या पदार्थ ) साम्ये ( एक समान होने से भी ) चित्त ( ज्ञान या जानकारी के ) भेदात् ( अलग- अलग होने से ) तयो: ( उन दोनों अर्थात पदार्थ और उसके ज्ञान का ) पन्था ( मार्ग या अस्तित्व ) विभक्त:

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Yoga Sutra 4 – 15

परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वम् ।। 14 ।।   शब्दार्थ :- परिणाम ( परिणाम अर्थात फल के ) एक्त्वाद् ( एक होने से ) वस्तु ( वस्तु अथवा पदार्थ में ) तत्त्वम् ( एकत्व अर्थात एक समान भाव आ जाता है )     सूत्रार्थ :- परिणाम एक ही प्रकार का होने से वस्तु या पदार्थ में भी उसी

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Yoga Sutra 4 – 14

ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मान: ।। 13 ।।   शब्दार्थ :- ते ( वे अर्थात वह तीनों कालों में विद्यमान रहने वाले सभी पदार्थ ) व्यक्त ( प्रकट अर्थात प्रत्यक्ष ) सूक्ष्मा: ( छिपे हुए अर्थात अप्रत्यक्ष रूप में ) गुणात्मान: ( गुण रूप में मौजूद होते हैं )     सूत्रार्थ :- तीनों कालों में विद्यमान

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Yoga Sutra 4 – 13

अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद् धर्माणाम् ।। 12 ।।   शब्दार्थ :- धर्माणाम् ( धर्मों के अर्थात पदार्थ की विशेषताओं का ) अध्व ( काल अर्थात समय के ) भेदात् ( भेद अर्थात अन्तर से ) अतीत ( भूतकाल अर्थात जो बीत चुका ) अनागतम् ( भविष्य अर्थात आने वाला समय में ) स्वरूपत: ( पदार्थ या वस्तुएँ

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Yoga Sutra 4 – 12

हेतुफलाश्रयालम्बनै: संगृहीतत्वादेषामभावे तदभाव: ।। 11 ।।   शब्दार्थ :- हेतु ( कारण ) फल ( परिणाम ) आश्रय ( शरण ) आलम्बनै: ( अभिव्यक्ति से ही ) संगृहीतत्वात् ( वासनाओं का संग्रहण अथवा एक जगह इकट्ठा करना से ) एषाम् ( इन अर्थात उपर्युक्त चार कारणों के ) अभावे ( न होने से अर्थात इन

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Yoga Sutra 4 – 11