तत: क्लेशकर्मनिवृत्ति: ।। 30 ।।   शब्दार्थ :- तत: ( उस अर्थात उस धर्ममेघ नामक समाधि से ) क्लेश ( अविद्या आदि पंच क्लेशों व ) कर्म ( कर्म संस्कारों की ) निवृत्ति: ( समाप्ति हो जाती है )     सूत्रार्थ :- उस धर्ममेघ नामक समाधि के प्राप्त होने से योगी के सभी अविद्या

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Yoga Sutra 4 – 30

प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघ: समाधि: ।। 29 ।।     शब्दार्थ :- प्रसंख्याने ( बुद्धि व आत्मा की भिन्नता का ज्ञान अर्थात विवेकख्याति के प्राप्त होने पर ) अपि ( भी ) अकुसीदस्य ( सिद्धियों या विभूतियों में वैराग्य उत्पन्न हो जाता है ) सर्वथा ( पूरी तरह से ) विवेकख्याते: ( विवेकख्याति के प्राप्त होने

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Yoga Sutra 4 – 29

हानमेषां क्लेशवदुक्तम् ।। 28 ।।   शब्दार्थ :- एषाम् ( इन अर्थात इन पूर्व जन्म के संस्कारों का ) हानम् ( नाश ) क्लेशवत् ( क्लेशों की तरह ही ) उक्तम् ( होना कहा गया है )     सूत्रार्थ :- इन सभी पूर्व जन्म के संस्कारों का नाश भी क्लेशों की तरह ही होगा

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Yoga Sutra 4 – 28

तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्य: ।। 27 ।।   शब्दार्थ :- तत् ( उस विवेक ज्ञान के ) छिद्रेषु ( छिद्रों अथवा उसके बीच के अन्तर से ) संस्कारेभ्य: ( पूर्व जनित संस्कारों के कारण ) प्रत्ययान्तराणि ( विवेक ज्ञान के अलावा दूसरे पदार्थों का भी ज्ञान होता रहता है )     सूत्रार्थ :- पूर्व जन्म

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Yoga Sutra 4 – 27

तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम् ।। 26 ।।    शब्दार्थ :- तदा ( तब अर्थात योगी को विवेक ज्ञान की प्राप्ति होने पर ) चित्तम् ( उसका चित्त ) विवेकनिम्नम् ( विवेक ज्ञान के मार्ग का अनुसरण करता हुआ ) कैवल्य ( कैवल्य अर्थात मोक्ष या समाधि प्राप्त करने के लिए ) प्राग्भारम् ( उसकी ओर

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Yoga Sutra 4 – 26