विपरीतकरणी वर्णन   यत्किञ्चित् स्त्रवते चन्द्रादमृतं दिव्यरूपिण: । तत् सर्वं ग्रसते सूर्यस्तेन पिण्डो जरायुत: ।। 77 ।।   भावार्थ :- चन्द्र मण्डल से जिस दिव्य अमृत रस का स्त्राव ( टपकता ) होता है । उसका निरन्तर स्त्राव होने से उस अमृत रस को सूर्य मण्डल भस्म कर देता है । जिसके कारण मनुष्य में

Read More
Hatha Pradipika Ch. 3 [77-82]

जालन्धर बन्ध वर्णन   कण्ठ माकुञ्च्य हृदये स्थापयेच्चिबुकं दृढम् । बन्धो जालन्धराख्योऽयं जरामृत्युविनाशक: ।। 70 ।।   भावार्थ :- कण्ठ प्रदेश को सिकोड़ कर ठुड्डी को छाती पर मजबूती से लगाना जालन्धर बन्ध कहलाता है । इसका अभ्यास करने से साधक बुढ़ापा और मृत्यु से पर विजय प्राप्त कर लेता है ।   बध्नाति हि

Read More
Hatha Pradipika Ch. 3 [70-76]

मूलबन्ध विधि वर्णन   पार्षि्णभागेन सम्पीड्य योनिमाकुञ्चयेद्गुदम् । अपानमूर्ध्वमाकृष्य मूलबन्धोऽभिधीयते ।। 61 ।।   भावार्थ :- पैर की एड़ी से सीवनी प्रदेश अर्थात् अण्डकोश के नीचे के मूल भाग को दबाकर गुदा का आकुञ्चन करना चाहिए । अब अपान वायु को ऊपर की ओर खींचने की क्रिया को ही मूलबन्ध कहते हैं ।   अधोगतिमपानं

Read More
Hatha Pradipika Ch. 3 [61-69] – Mula Bandha

उड्डीयान बन्ध   बद्धो येन सुषुम्नायां प्राण स्तूड्डीयते यत: । तस्मादुड्डीयनाख्योऽयं योगिभि: समुदाहृत: ।। 55 ।।   भावार्थ :- रुके हुए प्राण को ऊपर की ओर सुषुम्ना नाड़ी में ले जाने के कारण ही योगियों ने इस विधि को उड्डीयान बन्ध कहा है ।     उड्डीनं कुरुते यस्मादविश्रान्तं महाखग: । उड्डीयानं तदेव स्यात्तत्र बन्धोऽभिधीयते

Read More
Hatha Pradipika Ch. 3 [55-60] – Uddiyan Bandha

चुम्बन्ती यदि लम्बिकाग्रमनिशं जिह्वारसस्यन्दिनी सक्षारा कटुकाम्लदुग्धसदृशी मध्वाज्यतुल्या तथा । व्याधीनां हरणं जरान्तकरणं शस्त्रागमोदीरणं तस्य स्यादमरत्वमष्टगुणितं सिद्धाङ्गनाकर्षणम् ।। 50 ।।   भावार्थ :- हमारी जीभ नमकीन, कड़वे, खट्टे, दूध,घी व शहद के समान रस को अनुभव करने वाली होती है । यदि साधक अपनी जीभ के अगले हिस्से ( अग्रभाग ) से तालु प्रदेश को स्पर्श

Read More
Hatha Pradipika Ch. 3 [50-54]