चौथा अध्याय ( प्रत्याहार वर्णन ) चौथे अध्याय में महर्षि घेरण्ड ने प्रत्याहार का वर्णन किया है । प्रत्याहार को इन्होंने योग के चौथे अंग के रूप में माना है । प्रत्याहार के पालन से साधक को धैर्य की प्राप्ति होती है अर्थात् धैर्य को प्रत्याहार का फल बताया गया है । …
सभी मुद्राओं का फल इदं तु मुद्रापटलं कथितं चण्ड ते शुभम् । वल्लभं सर्वसिद्धानां जरामरणनाशनम् ।। 94 ।। भावार्थ :- महर्षि घेरण्ड राजा चण्डकापालिक को कहते हैं कि मैंने मुद्राओं के विषय में वर्णन करने वाले अध्याय का वर्णन तुम्हारे सामने किया है । यह सभी मुद्राएँ सभी विद्वानों अथवा सिद्ध पुरुषों को …
मातङ्गिनी मुद्रा विधि व फल वर्णन कण्ठमग्ने जले स्थित्वा नासाभ्यां जलमाहरेत् । मुखान्निर्गमयेत् पश्चात् पुनर्वक्त्रेण चाहरेत् ।। 88 ।। नासाभ्यां रेचयेत् पश्चात् कुर्यादेवं पुनः पुनः । मातङ्गिनी परा मुद्रा जरामृत्युविनाशिनी ।। 89 ।। विरले निर्जने देशे स्थित्वा चैकाग्रमानस: । कुर्यान्मातङ्गिनीं मुद्रां मातङ्ग इव जायते ।। 90 ।। यत्र यत्र स्थितोयोगी सुख मत्यन्तमश्नुते । तस्मात् …
अश्वनी मुद्रा विधि व फल वर्णन आकुञ्चयेद् गुदाद्वारं प्रकाशयेत् पुनः पुनः । सा भवेदश्विनी मुद्रा शक्तिप्रबोधकारिणी ।। 82 ।। अश्वनी परमा मुद्रा गुह्यरोगविनाशिनी । बलपुष्टिकरी चैव अकालमरणं हरेत् ।। 83 ।। भावार्थ :- गुदाद्वार अथवा गुदा को बार- बार सिकोड़ना ( अन्दर खींचना ) व फैलाना ( बाहर की ओर धकेलना ) अश्वनी …
आकाशीय धारणा मुद्रा विधि वर्णन यत् सिन्धौ वरशुद्धवारिसदृशं व्योमं परं भासितं तत्त्वं देवसदाशिवेन सहितं बीजं हकारान्वितम् । प्राणां विनीय पञ्चघटिकांश्चित्तान्वितां धारयेत् ऐषा मोक्षकपाटभेदनकरी कुर्यान्नभोधारणा ।। 80 ।। भावार्थ :- इस आकाशीय धारणा मुद्रा का वर्ण अर्थात् रंग सिन्धु नदी के जल जैसा होता है । यह आकाश तत्त्व का प्रतिनिधित्व करती है । …
