काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः । धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥ 17 ।। द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते । सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्‌ ॥ 18 ।।     व्याख्या :-  इसके बाद श्रेष्ठ धनुर्धर काशिराज, महारथी शिखण्डी, सेनापति धृष्टद्युम्न, राजा विराट, कभी भी पराजित न होने वाले सात्यिक, राजा द्रुपद, द्रौपदी के पाँचों पुत्रों व सुभद्रा के

Read More
Bhagwad Geeta Ch. 1 [17-21]

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ । माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतु: ।। 14 ।।      व्याख्या :-  इसके बाद सफेद घोड़ों से जुते हुए ( सुज्जित ) रथ में बैठे श्रीकृष्ण और अर्जुन ने भी कौरवों की ओर से बजाये गए शंखों का उत्तर देते हुए ( युद्ध हेतु ) अपने- अपने दिव्य शंख

Read More
Bhagwad Geeta Ch. 1 [14-16]

अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम । नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते ॥ 7 ।। भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः । अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च ॥ 8 ।। अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः । नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ 9 ।। अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌ । पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌ ॥ 10 ।। अयनेषु च

Read More
Bhagwad Geeta Ch. 1 [7-13]

पहला अध्याय ( अर्जुन विषादयोग ) इस पहले अध्याय में कुरुक्षेत्र के मैदान में एक- दूसरे के सामने खड़ी हुई पाण्डवों व कौरवों की सेना का दृश्य दिखाई देता है । यहाँ से गीता शुरू होती है । इसी अध्याय में अर्जुन को अपने स्वजनों के प्रति मोह हो जाता है । जिससे अर्जुन को

Read More
Bhagwad Geeta Ch. 1 [1-6]

अठारहवां अध्याय ( मोक्ष- सन्यासयोग ) यह गीता का अन्तिम व सबसे बड़ा अध्याय है । जिसमें कुल अठत्तर ( 78 ) श्लोकों का वर्णन किया गया है । इस अध्याय में पूरी गीता का सार भरा हुआ है । इसको गीता का उपसंहार भी कहा जाता है । यहाँ पर एक प्रकार से पूरी

Read More
Geeta Introduction – 18