बुद्धि के भेद व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाका ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥ 41 ।। व्याख्या :- हे कुरुनन्दन अर्जुन ! निष्काम कर्मयोग करने वालों की बुद्धि निश्चित रूप से एक ही होती है । जबकि इसके विपरीत सकाम कर्म वाले व्यक्तियों की बुद्धि अनेक प्रकार की होती है । कामनाएँ अनेक प्रकार की होने …
अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः । निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥ 36 ।। व्याख्या :- इस प्रकार तेरे सभी शत्रु तुम्हारी योग्यता की निन्दा अर्थात् बुराई करते हुए तुम्हें अनेकों ऐसी बातें कहेंगे, जोकि कहने योग्य नहीं हैं । तुम्हारी योग्यता की निन्दा से अधिक दु:खदायक तुम्हारे लिए और क्या हो सकता है …
स्वधर्म की उपयोगिता स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि । धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥ 31 ।। व्याख्या :- इसलिए अपने स्वधर्म ( स्वाभाविक कर्म ) को ध्यान में रखते हुए इस विपरीत परिस्थिति में तुम्हे विचलित नहीं होना चाहिए । क्योंकि एक क्षत्रिय व्यक्ति के लिए युद्ध से बड़ा और कोई धर्म अथवा कल्याणकारी …
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ 28 ।। व्याख्या :- हे भारत ! ( भरतवंशी ) संसार के सभी प्राणी अपने जन्म से पहले अव्यक्त अर्थात् अदृश्य रहते हैं । जन्म के बाद वह व्यक्त अर्थात् दिखाई देते हैं और मरने के बाद वह फिर से अव्यक्त अर्थात् दिखाई …
आत्मा की अमरता / विशेषताएँ नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः । न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ 23 ।। अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च । नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ 24 ।। अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते । तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ 25 ॥ व्याख्या :- इस आत्मा को कोई भी शस्त्र काट नहीं सकता, आग इसे …
