ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्चये । मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ।। 12 ।। व्याख्या :- ये सात्त्विक, राजसिक व तामसिक भाव अथवा गुण हैं, इनकी उत्पत्ति का आधार भी मैं ही हूँ, लेकिन ये सब मुझसे उत्पन्न होते हैं, पर मैं उनसे रहित हूँ अर्थात् यह सभी मेरे अधिकार …
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ।। 7 ।। व्याख्या :- हे धनंजय ! मुझसे परे अन्य कोई भी नहीं है अर्थात् मेरे अलावा इस जगत् की उत्पत्ति का कोई अन्य आधार नहीं है । जिस प्रकार सूत्र के धागे में अनेकों मोती पिरोये होते हैं, उसी प्रकार …
आठ प्रकार की अपरा प्रकृति भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ।। 4 ।। अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ।। 5 ।। व्याख्या :- भगवान श्रीकृष्ण अपनी अपरा प्रकृति को बताते हुए कहते हैं – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, …
सातवां अध्याय ( ज्ञान- विज्ञान योग ) सातवें अध्याय में योगीराज श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि इस ब्रह्म ज्ञान को जानने के बाद कोई भी ऐसा ज्ञान शेष नहीं बचता है, जिसे जानना जरूरी हो । इस अध्याय में कुल तीस ( 30 ) श्लोकों का वर्णन किया गया है । जिसमें परब्रह्ना की …
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो यात परां गतिम् ।। 45 ।। व्याख्या :- इस प्रकार जो योगी पूर्ण रूप से प्रयत्नशील होकर अथवा पूर्ण मनोयोग से अभ्यास करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर अनेक जन्मों द्वारा बहुत सारी सिद्धियाँ प्राप्त करके, परमगति अर्थात् मोक्ष को प्राप्त कर लेता है । …
