त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापायज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते । ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ।। 20 ।। व्याख्या :- तीनों वेदों को जानने वाले, सोम रस पीने वाले और निष्पापी (सदा पुण्य कर्म करने वाले ) लोग यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग आदि को प्राप्त करने के लिए मेरी प्रार्थना करते हैं । मुझे पूजने …
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ते यजन्तो मामुपासते । एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ।। 15 ।। व्याख्या :- अन्य भक्तों के अलावा ज्ञानी योगी भी मेरी पूजा- उपासना करते हैं, इस विश्व में कुछ भक्त एक तत्त्व रूप में ( अभेद रूप में अथवा एक रूप में ) ही मेरी उपासना करते हैं अथवा मुझे भजते हैं, …
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ।। 11 ।। मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ।। 12 ।। व्याख्या :- अज्ञानी लोग मेरे सम्पूर्ण प्राणियों के ईश्वर वाले वास्तविक स्वरूप को न जानकर, मुझे सामान्य शरीर वाला मनुष्य समझकर मेरी अवहेलना करते हैं । …
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् । कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ।। 7 ।। व्याख्या :- हे कौन्तेय ! कल्प ( सृष्टि के प्रलयकाल ) के समय यह सारा जगत् नष्ट होकर, मुझमें ही विलीन हो जाते हैं अर्थात् यह सभी मुझमें ही आ मिलते हैं और कल्प के आदि ( सृष्टि के आदि …
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेषवस्थितः ।। 4 ।। न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् । भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ।। 5 ।। व्याख्या :- यह जो दिखाई देने वाला सम्पूर्ण जगत् है, मैंने ही इसका निर्माण किया है । इस जगत् में व्याप्त सभी प्राणी …
