रजोगुण का प्रभाव रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् । तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ।। 7 ।। व्याख्या :- हे कौन्तेय ! यह रजोगुण रागात्मक होता है, जो इच्छाओं के प्रति आकर्षण अथवा आसक्ति से उत्पन्न होता है । यह जीवात्मा को कर्मफल के प्रति आसक्त ( लगाव ) करके शरीर के साथ बाँधता …
बीज स्थापना ( गर्भ स्थापना ) सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ।। 4 ।। व्याख्या :- हे कौन्तेय ! सभी योनियों में जितने भी मूर्त रूप ( शरीरधारी ) प्राणी जन्म लेते हैं, उनकी ब्रह्म रूप प्रकृति योनि है और मैं उस योनि में बीज की …
चौदहवां अध्याय ( गुणत्रय विभागयोग ) इस चौदहवें अध्याय में मुख्य रूप से गुणों के विभागों ( सत्त्वगुण, रजोगुण व तमोगुण ) की चर्चा की गई है । इसमें कुल सत्ताईस ( 27 ) श्लोक कहे गए हैं । गुणों के विषय में कहा गया है कि पूरी प्रकृति इन तीन गुणों से ही निर्मित …
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः । ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ।। 29 ।। व्याख्या :- मैं सभी प्राणियों को समान भाव से देखता हूँ । मुझे न तो किसी प्राणी से द्वेष है और न ही किसी प्राणी से प्रेम है । जो भी भक्त …
यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः । भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ।। 25 ।। व्याख्या :- देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त करते हैं, पितरों ( पूर्वजों ) को पूजने वाले पितरों को, भूतों ( सामान्य प्राणियों ) को पूजने वाले सामान्य प्राणियों को और मुझे पूजने वाले भक्त मुझे प्राप्त …
