फलासक्ति का त्याग अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः । सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ।। 11 ।। व्याख्या :- यदि तुम मेरे लिए कर्म करने में भी असमर्थ हो अर्थात् यदि तुम अपने समस्त कर्मों को मुझमें समर्पित करने में भी समर्थ नहीं हो, तो तुम मेरा आश्रय लेकर अपनी आत्मा को बलवान बनाते …
अभ्यास योग अथ चित्तं समाधातुं न शक्रोषि मयि स्थिरम् । अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ।। 9 ।। व्याख्या :- इस प्रकार यदि तुम्हारा चित्त मुझमें स्थिर न भी हो पाए तो हे धनंजय ! अभ्यास योग द्वारा अपने चित्त को एकाग्र करने का बार – बार प्रयास करते हुए मुझे प्राप्त …
क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ।। 5 ।। व्याख्या :- जिनके चित्त में आसक्ति का भाव भरा हुआ है, उनके लिए मेरे इस अव्यक्त ( निराकार ) स्वरूप की उपासना करने में अधिक कठिनाई या पीड़ा का अनुभव होता है, क्योंकि देहधारी मनुष्यों द्वारा अव्यक्त उपासना के मार्ग को प्राप्त करना बहुत …
बारहवां अध्याय ( भक्तियोग ) इस अध्याय में सच्चे भक्त के गुणों का वर्णन किया गया है साथ ही श्रीकृष्ण बताते हैं कि उनको किस प्रकार का भक्त सबसे अधिक प्रिय है ? इस अध्याय में कुल बीस ( 20 ) श्लोकों का ही वर्णन किया गया है । सर्वप्रथम अर्जुन पूछता है कि जो …
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ।। 32 ।। व्याख्या :- जिस प्रकार चारों ओर व्याप्त आकाश सूक्ष्म रूप में होने के कारण किसी के साथ लिप्त ( लीन ) नहीं होता, ठीक उसी प्रकार यह आत्मा भी सम्पूर्ण शरीर में स्थित होते हुए भी शरीर के साथ लिप्त अथवा …
