समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्‌ । न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्‌ ।। 28 ।।       व्याख्या :-  जो मनुष्य उस अविनाशी परमेश्वर को सभी प्राणियों में समान रूप से स्थित देखकर अपनी आत्मा में हीन – भावना नहीं आने देता, वह निश्चित रूप से परमगति को प्राप्त होता है ।     प्रकृति

Read More
Bhagwad Geeta Ch. 13 [28-31]

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ।। 32 ।।     व्याख्या :-  जिस प्रकार चारों ओर व्याप्त आकाश सूक्ष्म रूप में होने के कारण किसी के साथ लिप्त ( लीन ) नहीं होता, ठीक उसी प्रकार यह आत्मा भी सम्पूर्ण शरीर में स्थित होते हुए भी शरीर के साथ लिप्त अथवा

Read More
Bhagwad Geeta Ch. 13 [32-34]