पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्‌ । सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ।। 24 ।।       व्याख्या :-  हे पार्थ ! पुरोहितों में मुझे मुख्य पुरोहित बृहस्पति जानो, सेनापतियों अथवा सेनानायकों में मैं कार्तिकेय हूँ और जलाशयों में मैं समुद्र हूँ ।     महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्‌ । यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ।।

Read More
Bhagwad Geeta Ch. 10 [24-27]

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्‌ । प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ।। 28 ।।       व्याख्या :-  सभी अस्त्रों में मैं वज्र हूँ, गायों में मैं कामधेनु गाय हूँ, सन्तान पैदा करने वाला कामदेव भी मैं ही हूँ और सर्पों में सर्पराज वासुकि भी मैं ही हूँ ।     विशेष :-  वज्र सभी अस्त्रों

Read More
Bhagwad Geeta Ch. 10 [28-31]

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन । अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्‌ ।। 32 ।।     व्याख्या :-  हे अर्जुन ! इस पूरी सृष्टि का आदि, मध्य और अन्त मैं ही हूँ, सभी विद्याओं में मैं अध्यात्म विद्या हूँ और सभी प्रवादों में वाद भी मैं ही हूँ ।     विशेष :-  सृष्टि के आदि का अर्थ

Read More
Bhagwad Geeta Ch. 10 [32-35]

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्‌ । जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्‌ ।। 36 ।।     व्याख्या :-  छल करने वालों में मैं द्युत अर्थात् जुआ हूँ और तेजस्वियों में मैं तेज हूँ । विजेताओं में मैं विजय हूँ, निश्चय करने वालों का मैं निश्चय हूँ और सत्त्वशीलों में मैं सत्त्व गुण वाला हूँ ।     वृष्णीनां

Read More
Bhagwad Geeta Ch. 10 [36-39]

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप । एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ।। 40 ।।     व्याख्या :-  हे परन्तप ! ( अर्जुन ) मेरी दिव्य विभूतियों के विस्तार का कोई अन्त नहीं है अर्थात् मेरी विभूतियाँ अनन्त हैं । यहाँ पर मैंने अपनी विभूतियों का सार रूप में वर्णन किया है ।    

Read More
Bhagwad Geeta Ch. 10 [40-42]