यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः । कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्‌ ॥ 38 ।। कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्‌ । कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ 39 ।।   व्याख्या :-  यद्यपि लोभ के वशीभूत होकर उनकी ( कौरवों की ) की बुद्धि भ्रष्ट ( खराब )  हो चुकी है । जिसके कारण उन्हें मित्रद्रोह व कुल में नाश

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Bhagwad Geeta Ch. 1 [38-44]

अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्‌ । यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ 45 ।। यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः । धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्‌ ॥ 46 ।।     व्याख्या :-  यह तो बड़े ही आश्चर्य की बात है कि राज्य के सुख व लालच को पाने में हम अपने ही सगे – संबंधियों को मारने जैसा

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Bhagwad Geeta Ch. 1 [45-47]