यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि ।। 29 ।।   शब्दार्थ :- यम ( अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य अपरिग्रह ) नियम ( शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान ) आसन ( शरीर की स्थिर व सुखपूर्ण अवस्था ) प्राणायाम ( श्वास व प्रश्वास की गति पर नियंत्रण ) प्रत्याहार ( इन्द्रियों पर नियंत्रण ) धारणा ( चित्त की स्थिरता )

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Yoga Sutra 2 – 29

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमा: ।। 30 ।।   शब्दार्थ :- अहिंसा ( किसी भी प्राणी को पीड़ा न पहुँचाना ) सत्य ( जो जैसा हो उसे वैसा ही कहना ) अस्तेय ( चोरी न करना ) ब्रह्मचर्य ( मोक्षकारक ग्रन्थों का अध्ययन व गुप्तेन्द्रियों का संयम ) अपरिग्रह ( अनावश्यक पदार्थों का संग्रह न करना )  

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Yoga Sutra 2 – 30

जातिदेशकालसमयानवच्छिन्ना: सार्वभौमा महाव्रतम् ।। 31 ।।   शब्दार्थ :- जाति ( कोई प्राणी विशेष ) देश ( कोई स्थान विशेष ) काल ( कोई पर्व या तिथि विशेष ) समय ( कोई अवसर विशेष ) अनवच्छिन्ना: ( इन सब बाधाओं से रहित ) सार्वभौमा: ( सभी परिस्थितियों में पालन करने के योग्य ) महाव्रतम् (

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Yoga Sutra 2 – 31

शौचसन्तोषतप: स्वाध्यायेश्वर प्रणिधानानि नियमा: ।। 32 ।।    शब्दार्थ :- शौच ( शुद्धि ) सन्तोष ( मेहनत से जो मिले, उसी में सब्र करना ) तप: ( द्वंद्वों को सहना ) स्वाध्याय ( मोक्षकारक ग्रन्थों का अध्ययन ) ईश्वर प्रणिधान ( समस्त कर्मों को भगवान को समर्पित कर देना )   सूत्रार्थ :- शारीरिक व

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Yoga Sutra 2 – 32

वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ।। 33 ।।    शब्दार्थ :- विर्तक ( विपरीत विचारों से ) बाधने ( बाधा उत्पन्न होने पर ) प्रतिपक्ष ( विरोधी या विरुद्ध विचारों का ) भावनम् ( चिन्तन करना )   सूत्रार्थ :- यम- नियमों का पालन करते हुए साधक को जब विपरीत विचार सताने लगें । तो साधक को उन

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Yoga Sutra 2 – 33

वितर्का हिंसादय: कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् ।। 34 ।।    शब्दार्थ :- हिंसादय: ( हिंसा आदि विचार ) वितर्का ( ही विरोधी विचार होते हैं ) कृत ( स्वयं किये हुए ) कारित ( दुसरों से करवाए हुए ) अनुमोदिता: ( दूसरों की हिंसा का समर्थन करने वाले ) लोभ ( लालच )

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Yoga Sutra 2 – 34

अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्याग: ।। 35 ।।    शब्दार्थ :- अहिंसा- प्रतिष्ठायां (  हिंसा के भाव से पूरी तरह से मुक्त होने पर अर्थात अहिंसा के सिद्ध होने पर ) तत् – सन्निधौ ( उसके निकट या पास रहने वालों का ) वैरत्याग: ( आपस में वैरभाव समाप्त हो जाता है । )   सूत्रार्थ :-

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Yoga Sutra 2 – 35