मा ते व्यथा मा च विमूढभावोदृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् । व्यतेपभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वंतदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ।। 49 ।। व्याख्या :- मेरे इस अत्यन्त विकराल स्वरूप को देखकर न तो तुम्हें व्याकुलता होनी चाहिए और न ही मूढ़ता, तुम भय से मुक्त होकर प्रसन्न मन के साथ पुनः ( दोबारा ) मेरे उसी …
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे । तदेव मे दर्शय देवरूपंप्रसीद देवेश जगन्निवास ।। 45 ।। व्याख्या :- हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आपके पहले कभी भी न देखे हुए इस विराट स्वरूप को देखकर मैं हर्षित ( खुश ) भी हूँ और साथ ही मेरा मन भय से …
अर्जुन द्वारा श्रीकृष्ण से क्षमा याचना सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति । अजानता महिमानं तवेदंमया प्रमादात्प्रणयेन वापि ।। 41 ।। यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु । एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षंतत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ।। 42 ।। व्याख्या :- हे अच्युत ! ( कृष्ण ) आपकी इस अपार महिमा को न जानते हुए ( अनजाने …
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे । अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ।। 37 ।। त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ।। 38 ।। व्याख्या :- हे महात्मन् ! आप ही ब्रह्मा के आदिकारण ( उत्पत्ति का मूल ) व सबसे …
श्रीभगवानुवाच कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धोलोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः । ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ।। 32 ।। व्याख्या :- भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं – मैं यहाँ पर सभी लोकों को नष्ट करने के लिए विकराल रूप धारण किया हुआ महाकाल हूँ, जो सभी लोकों का संहार करने के लिए ही प्रवृत्त हुआ हूँ । …
