नाड़ी शुद्धि वर्णन कुशासने मृगाजिने व्याघ्राजिने च कम्बले । स्थलासने समासीन: प्राङ्मुखो वाप्युदङ्मुख: । नाड़ीशुद्धिं समासाद्य प्राणायामं समभ्यसेत् ।। 32 ।। भावार्थ :- प्राणायाम का अभ्यास करने से पहले योगी को नाड़ीशुद्धि का अभ्यास करना चाहिए । इसके लिए उपयुक्त आसन ( बैठने के स्थान ) बताते हुए कहा है कि साधक को …
योगी के लिए खाद्य ( खाने योग्य ) पदार्थ एलाजातिलवङ्गं च पौरुषं जम्बु जाम्बुलम् । हरीतकीं च खर्जूरं योगी भक्षणमाचरेत् ।। 27 ।। लघुपाकं प्रियं स्निग्धं तथा धातुप्रपोषणम् । मनोऽभिलषितं योग्यं योगी भोजनमाचरेत् ।। 28 ।। भावार्थ :- इलायची, लौंग, पका हुआ फालसा, जामुन, जाम्बुल ( जामुन का मोटा रूप अर्थात् जमोया ), …
मिताहार की उपयोगिता मिताहारं विना यस्तु योगारम्भं तु कारयेत् । नानारोगो भवेत्तस्य किञ्चिद्योगो न सिद्धयति ।। 16 ।। भावार्थ :- जो साधक बिना मिताहार का पालन किये ही योगाभ्यास को शुरू कर देता है । उसे अनेक प्रकार के रोग हो जाते हैं साथ ही उसे योग में नाममात्र सिद्धि भी नहीं मिलती …
योगाभ्यास के लिए वर्जित काल समय हेमन्ते शिशिरे ग्रीष्मे वर्षायां च ऋतौ तथा । योगारम्भं न कुर्वीत कृते योगो हि रोगाद: ।। 8 ।। भावार्थ :- साधक को हेमन्त, शिशिर, ग्रीष्म और वर्षा ऋतुओं में योग साधना का अभ्यास शुरू नहीं करना चाहिए । इन ऋतुओं में अभ्यास करने पर रोग होने …
पाँचवा अध्याय ( कुम्भक / प्राणायाम वर्णन ) पाँचवें अध्याय में मुख्य रूप से आठ प्रकार के प्राणायामों ( कुम्भकों ) की चर्चा की गई है । प्राणायाम का अभ्यास करने से साधक के शरीर में लघुता अर्थात् हल्कापन आता है । इस अध्याय में प्राणायाम के अतिरिक्त अन्य कई विषयों पर भी प्रकाश डाला …
