अश्वनी मुद्रा विधि व फल वर्णन   आकुञ्चयेद् गुदाद्वारं प्रकाशयेत् पुनः पुनः । सा भवेदश्विनी मुद्रा शक्तिप्रबोधकारिणी ।। 82 ।। अश्वनी परमा मुद्रा गुह्यरोगविनाशिनी । बलपुष्टिकरी चैव अकालमरणं हरेत् ।। 83 ।।   भावार्थ :-  गुदाद्वार अथवा गुदा को बार- बार सिकोड़ना ( अन्दर खींचना ) व फैलाना ( बाहर की ओर धकेलना ) अश्वनी

Read More
Gheranda Samhita Ch. 3 [82-87]

मातङ्गिनी मुद्रा विधि व फल वर्णन   कण्ठमग्ने जले स्थित्वा नासाभ्यां जलमाहरेत् । मुखान्निर्गमयेत् पश्चात् पुनर्वक्त्रेण चाहरेत् ।। 88 ।। नासाभ्यां रेचयेत् पश्चात् कुर्यादेवं पुनः पुनः । मातङ्गिनी परा मुद्रा जरामृत्युविनाशिनी ।। 89 ।। विरले निर्जने देशे स्थित्वा चैकाग्रमानस: । कुर्यान्मातङ्गिनीं मुद्रां मातङ्ग इव जायते ।। 90 ।। यत्र यत्र स्थितोयोगी सुख मत्यन्तमश्नुते । तस्मात्

Read More
Gheranda Samhita Ch. 3 [88-93]

सभी मुद्राओं का फल   इदं तु मुद्रापटलं कथितं चण्ड ते शुभम् । वल्लभं सर्वसिद्धानां जरामरणनाशनम् ।। 94 ।।   भावार्थ :-  महर्षि घेरण्ड राजा चण्डकापालिक को कहते हैं कि मैंने मुद्राओं के विषय में वर्णन करने वाले अध्याय का वर्णन तुम्हारे सामने किया है । यह सभी मुद्राएँ सभी विद्वानों अथवा सिद्ध पुरुषों को

Read More
Gheranda Samhita Ch. 3 [94-100]