चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः । कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ।। 11 ।।     व्याख्या :-  मृत्युपर्यन्त जीवित रहने वाली अनेक चिन्ताओं का आश्रय अथवा सहारा लेने वाले, काम और भोग को ही श्रेष्ठ मानने वाले लोगों का यही निश्चित मत होता है कि यह काम और भोग ही जीवन का अन्तिम लक्ष्य होते हैं ।  

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Bhagwad Geeta Ch. 16 [11-16]

आसुरी प्रवृत्ति से युक्त मनुष्यों के लक्षण   प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः । न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ।। 7 ।।       व्याख्या :-  जो आसुरी सम्पदा वाले व्यक्ति होते हैं, वह प्रवृत्ति और निवृत्ति के विषय में नहीं जानते अर्थात् उन्हें क्या करना चाहिए और क्या

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Bhagwad Geeta Ch. 16 [7-10]

छ: आसुरी अवगुण ( आसुरी प्रवृत्ति के लक्षण )    दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च । अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्‌ ।। 4 ।।     व्याख्या :-  अब श्रीकृष्ण आसुरी सम्पदा के साथ पैदा हुए लक्षणों का वर्णन करते हुए कहते हैं – हे पार्थ ! दम्भ ( स्वयं को झूठे रूप में प्रस्तुत करना

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Bhagwad Geeta Ch. 16 [4-6]

सोलहवां अध्याय ( दैवासुर सम्पद् विभागयोग )   जिस प्रकार नाम से ही विदित होता है कि इस अध्याय में दैवी व आसुरी प्रवृत्ति वाले व्यक्तियों के लक्षणों का वर्णन किया गया है । इसमें कुल चौबीस ( 24 ) श्लोकों के द्वारा दैवी व आसुरी शक्तियों का वर्णन किया गया है । इसमें पहले

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Bhagwad Geeta Ch. 16 [1-3]

श्रीभगवानुवाच सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम । देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्‍क्षिणः ।। 52 ।। नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । शक्य एवं विधो द्रष्टुं दृष्ट्वानसि मां यथा ।। 53 ।।       व्याख्या :-  भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं – तुमने जो मेरे इस अति दुर्लभ स्वरूप को देखा है, देवता भी सदा

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Bhagwad Geeta Ch. 11 [52-55]