सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत । श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ।। 3 ।। व्याख्या :- हे भारत ! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके सत्त्व स्वरूप अर्थात् उनके वास्तविक स्वरूप के अनुसार ही होती है । प्रत्येक मनुष्य श्रद्धा से युक्त होता है, जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, वह ठीक वैसा …
सत्रहवां अध्याय ( श्रद्धात्रय विभागयोग ) इस पूरे अध्याय में श्रद्धा, आहार, यज्ञ, तप व दान के तीन – तीन प्रकारों का वर्णन किया गया है । इसलिए इस अध्याय का नाम श्रद्धात्रय रखा गया है । जिसमें श्रद्धा के साथ- साथ अन्य अंगों के भी तीन- तीन प्रकार बताये गए हैं । इसमें …
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ।। 23 ।। व्याख्या :- इसके विपरीत जो व्यक्ति शास्त्र विधि को छोड़कर अपनी इच्छानुसार व्यवहार करता है, तो उसे न सिद्धि मिलती है, न सुख मिलता है और न ही परमगति प्राप्त होती है । कार्य …
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि । मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ।। 20 ।। व्याख्या :- हे कौन्तेय ! वह मूर्ख लोग मुझे प्राप्त न होकर बार- बार असुर योनियों में ही जन्म लेते रहते हैं । इस प्रकार वह मुझे न प्राप्त करके आगे और भी अधिक पाप योनियों में जन्म लेते …
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः । यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ।। 17 ।। व्याख्या :- यह असुर व्यक्ति अपने आप को ही श्रेष्ठ मानने वाले, अभिमानपूर्ण अथवा कठोर व्यवहार करने वाले, धन और मद से युक्त होकर, शास्त्र विधि को छोड़कर, पाखण्ड पूर्ण तरीके से केवल नाममात्र का यजन – पूजन करते हैं । …
