ध्यान योग समाधि वर्णन   शाम्भवीं मुद्रिकां कृत्वा आत्मप्रत्यक्षमानयेत् । बिन्दुब्रह्ममयं दृष्ट्वा मनस्तत्र नियोजयेत् ।। 7 ।। खमध्ये कुरु चात्मानं आत्ममध्ये च खं कुरु । आत्मानं खमयं दृष्ट्वा न किञ्चिदपि बाधते । सदानन्दमयो भूत्वा समाधिस्थो भवेन्नर: ।। 8 ।।   भावार्थ :-  शाम्भवी मुद्रा का अभ्यास करते हुए साधक को अपनी आत्मा का साक्षात्कार करना

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Gheranda Samhita Ch. 7 [7-8]

समाधि के छ: ( 6 ) प्रकार   शाम्भव्या चैव भ्रामर्या खेचर्या योनिमुद्रया । ध्यानं नादं रसानन्दं  लयसिद्धिश्चुतुर्विधा ।। 5 ।। पञ्चधा भक्तियोगेन मनोमूर्च्छा च षड्विधा । षड्विधोऽयं राजयोग: प्रत्येकमवधारयेत् ।। 6 ।।   भावार्थ :-  शाम्भवी, भ्रामरी, खेचरी व योनिमुद्राओं से क्रमशः ध्यान योग समाधि, नादयोग समाधि, रसानन्द समाधि व लयसिद्धि योग नामक चार

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Gheranda Samhita Ch. 7 [5-6]

घटाद्भिन्नं मन: कृत्वा ऐक्यं कुर्यात् परात्मनि । समाधिं तं विजानीयान्मुक्तसंज्ञो दशादिभि: ।। 3 ।। अहं ब्रह्म न चान्योऽस्मि ब्रह्मैवाहं न शोकभाक् । सच्चिदानंदरूपोऽहं नित्यमुक्त: स्वभाववान् ।। 4 ।।   भावार्थ :- जब साधक अपने मन को शरीर से अलग समझकर उसका ( मन का )  परमात्मा के साथ एकीकरण कर देता है । तब वह

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Gheranda Samhita Ch. 7 [3-4]

सातवां अध्याय ( समाधि योग ) घेरण्ड संहिता का यह अन्तिम अध्याय है । जिसमें महर्षि घेरण्ड ने अपने सप्तांग योग के अन्तिम अंग अर्थात् समाधि योग का वर्णन किया है । घेरण्ड संहिता के प्रत्येक अध्याय में योग के एक अंग का वर्णन किया गया है । जिसके अनुसार सात अध्यायों के माध्यम से

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Gheranda Samhita Ch. 7 [1-2]

सूक्ष्म ध्यान वर्णन   तेजोध्यानं श्रुतं चण्ड सूक्ष्मध्यानं श्रृणुष्व मे । बहुभाग्यवशाद् यस्य कुण्डली जाग्रती भवेत् ।। 18 ।। आत्मना सहयोगेन नेत्ररंध्राद्विनिर्गता । विहरेद् राजमार्गे च चञ्चलत्वान्न दृश्यते ।। 19 ।। शाम्भवीमुद्रया योगी ध्यानयोगेन सिध्यति । सूक्ष्मध्यानमिदं गोप्यं देवानामपि दुर्लभम् ।। 20 ।।     भावार्थ :-  हे चण्ड! तेजोमय ध्यान ( ज्योति ध्यान )

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Gheranda Samhita Ch. 6 [18-22]