ज्ञान के तत्त्व   अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्‌ । आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ।। 7 ।। इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्‍कार एव च । जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्‌ ।। 8 ।। असक्तिरनभिष्वङ्‍ग: पुत्रदारगृहादिषु ।  नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ।। 9 ।। मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी । विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ।। 10 ।। अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्‌ । एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ।। 11 ।।       व्याख्या :-  अभिमान (

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Bhagwad Geeta Ch. 13 [7-11]

क्षेत्र का स्वरूप   महाभूतान्यहङ्‍कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च । इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ।। 5 ।। इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्‍घातश्चेतना धृतिः । एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्‌ ।। 6 ।।       व्याख्या :-  पंच महाभूत ( आकाश, वायु, अग्नि, जल व पृथ्वी ), अहंकार, बुद्धि, मन, अव्यक्त प्रकृति, दस इन्द्रियाँ ( पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ- पाँच

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Bhagwad Geeta Ch. 13 [5-6]

तेरहवां अध्याय ( क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग ) इस अध्याय में मुख्य रूप से क्षेत्र ( शरीर ) व क्षेत्रज्ञ ( आत्मा ) के स्वरूप का वर्णन कुल चौतीस ( 34 ) श्लोकों के माध्यम से किया गया है । सबसे पहले श्रीकृष्ण क्षेत्र व क्षेत्रज्ञ को समझाते हुए कहते हैं कि इस शरीर को क्षेत्र व आत्मा

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Bhagwad Geeta Ch. 13 [1-4]

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप । एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ।। 40 ।।     व्याख्या :-  हे परन्तप ! ( अर्जुन ) मेरी दिव्य विभूतियों के विस्तार का कोई अन्त नहीं है अर्थात् मेरी विभूतियाँ अनन्त हैं । यहाँ पर मैंने अपनी विभूतियों का सार रूप में वर्णन किया है ।    

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Bhagwad Geeta Ch. 10 [40-42]

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्‌ । जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्‌ ।। 36 ।।     व्याख्या :-  छल करने वालों में मैं द्युत अर्थात् जुआ हूँ और तेजस्वियों में मैं तेज हूँ । विजेताओं में मैं विजय हूँ, निश्चय करने वालों का मैं निश्चय हूँ और सत्त्वशीलों में मैं सत्त्व गुण वाला हूँ ।     वृष्णीनां

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Bhagwad Geeta Ch. 10 [36-39]