श्रीभगवानुवाच   विराट स्वरूप का दर्शन पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः । नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ।। 5 ।।     व्याख्या :- श्रीकृष्ण कहते हैं- हे पार्थ ! अब तुम मेरे सैकड़ो, हजारों अलग- अलग प्रकार के व अलग- अलग रंगों और आकृति वाले दिव्य रूपों को देखो ।       पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ

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Bhagwad Geeta Ch. 11 [5-9]

ग्यारहवां अध्याय ( विश्वरूपदर्शनयोग ) इस अध्याय में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपने विराट स्वरूप के दर्शन करवाने का वर्णन किया गया है । अभी तक अर्जुन श्रीकृष्ण के साथ अनेक तर्क- वितर्क कर रहा था । उसे श्रीकृष्ण के इस दिव्य शक्ति का अनुमान नहीं था । जब श्रीकृष्ण अपनी महिमा के विषय में

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Bhagwad Geeta Ch. 11 [1-4]

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः । शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्‍गविवर्जितः ।। 18 ।। तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्‌ । अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ।। 19 ।।       व्याख्या :-  जिसके लिए मित्र और शत्रु दोनों ही एक समान हैं तथा जिसके लिए मान व अपमान दोनों ही परिस्थितियों एक समान हैं, जो सर्दी-

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Bhagwad Geeta Ch. 12 [18-20]

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः । सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ।। 16 ।।     व्याख्या :-  जो भक्त किसी से किसी भी प्रकार की अपेक्षा ( उम्मीद ) नहीं रखता, जो पवित्र ( शुद्ध ) है, जिसके कार्यों में कुशलता है, जो सबके प्रति उदासीनता ( न किसी से दोस्ती न किसी से

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Bhagwad Geeta Ch. 12 [16-17]

प्रिय भक्त के लक्षण   अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च । निर्ममो निरहङ्‍कारः समदुःखसुखः क्षमी ।। 13 ।। संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः । मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ।। 14 ।।       व्याख्या :-  जो भक्त किसी के प्रति द्वेष भावना नहीं रखता, जो सभी प्राणियों से मित्रता रखता है, जो

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Bhagwad Geeta Ch. 12 [13-15]