Shrimad Bhagwad Geeta
Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 10 [28-31]
अध्याय 10: विभूतियोग
मूल श्लोक · 10.28
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् । प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ।। 28 ।।
व्याख्या
सभी अस्त्रों में मैं वज्र हूँ, गायों में मैं कामधेनु गाय हूँ, सन्तान पैदा करने वाला कामदेव भी मैं ही हूँ और सर्पों में सर्पराज वासुकि भी मैं ही हूँ ।
विशेष
वज्र सभी अस्त्रों में सबसे मजबूत होता है । कामधेनु अनन्त व इच्छानुसार दूध देने वाली गाय होती है । सभी सर्पों में सर्वश्रेष्ठ अथवा सर्पों का राजा वासुकि होता है ।
मूल श्लोक · 10.29
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् । पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ।। 29 ।।
व्याख्या
नागों में मैं अनन्त शेषनाग हूँ, जलचरों में मैं वरुण हूँ, पित्तरों में मैं अर्यमा नामक पित्तर हूँ और संयमों में मैं यम हूँ ।
मूल श्लोक · 10.30
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् । मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ।। 30 ।।
व्याख्या
दैत्यों में मैं प्रह्लाद हूँ, कलने अथवा ग्रसने वालों में मैं काल हूँ, सभी पशुओं में मैं सिंह अर्थात् शेर हूँ और सभी पक्षियों में मैं गरुड़ पक्षी हूँ ।
विशेष
काल अथवा समय को कलने अथवा ग्रसने वाला इसलिए कहा जाता है क्योंकि काल का यह चक्र एक दिन सबको नष्ट कर देता है ।
मूल श्लोक · 10.31
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् । झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ।। 31 ।।
व्याख्या
पवित्र करने वालों में मैं पवन अथवा वायु हूँ, सभी शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ, जलचरों में मैं मगरमच्छ हूँ और सभी नदियों में मैं गंगा नदी हूँ ।