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Shrimad Bhagwad Geeta

Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 12 [5-8]

अध्याय 12: भक्तियोग

मूल श्लोक · 12.5

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्‌ । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ।। 5 ।।

व्याख्या

जिनके चित्त में आसक्ति का भाव भरा हुआ है, उनके लिए मेरे इस अव्यक्त ( निराकार ) स्वरूप की उपासना करने में अधिक कठिनाई या पीड़ा का अनुभव होता है, क्योंकि देहधारी मनुष्यों द्वारा अव्यक्त उपासना के मार्ग को प्राप्त करना बहुत कष्टकारी होता है ।

मूल श्लोक · 12.6

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्नयस्य मत्पराः । अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ।। 6 ।।

मूल श्लोक · 12.7

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्‌ । भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्‌ ।। 7 ।।

व्याख्या

लेकिन जो भक्त अपने सभी कर्मों का मुझमें पूर्णतया ( पूर्ण रूप से ) समर्पण करके, अनन्य भक्तिभाव से मेरा ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं -

हे पार्थ ! मुझमें अपने मन को लगाकर मुझपर आश्रित रहने वाले ऐसे भक्तों को मैं इस मृत्यु रूपी संसार - सागर से बिना किसी विलम्ब अर्थात् देरी के पार लगा देता हूँ अथवा बिना एक पल की देरी किए उनका उद्धार कर देता हूँ । इसमें किसी तरह का कोई सन्देह ( शक ) नहीं है ।

मूल श्लोक · 12.8

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ।। 8 ।।

व्याख्या

इसलिए तुम अपने मन व बुद्धि को मुझमें स्थिर करो, ऐसा करने से तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें किसी प्रकार का कोई संशय नहीं है ।

Reader discussion

Comments (4)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. ISHTEYAQUE Alam

    उम्दा

  2. Savita singh

    Best explain sir ????????

  3. Aashish malhan

    Nice guru ji

  4. Alok kumar Patwa

    ॐ गुरुदेव!

    अति उत्तम व्याख्या।