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Gheranda Samhita

Gheranda Samhita Ch. 7 [9-10]

अध्याय 7: समाधि

नादयोग समाधि वर्णन

मूल श्लोक · 7.9

अनिलं मन्दवेगेन भ्रामरीकुम्भकं चरेत् । मन्दं मन्दं रेचयेद्वायुं भृङ्गनादं ततो भवेत् ।। 9 ।।

मूल श्लोक · 7.10

अन्त:स्थं भ्रामरीनादं श्रुत्वा तत्र मनो नयेत् । समाधिर्जायते तत्र आनन्द: सोऽहमित्यत: ।। 10 ।।

भावार्थ

वायु को धीमी गति के साथ शरीर के अन्दर भरकर भ्रामरी कुम्भक करे । इसके बाद उस वायु को धीरे- धीरे बाहर निकालते हुए भँवरे जैसा नाद ( उच्चारण अथवा ध्वनि ) उत्पन्न होता है ।

इस प्रकार शरीर के अन्दर हो रहे उस नाद ( ध्वनि ) को सुनकर वहीं पर अपने मन को केन्द्रित करने से साधक की समाधि लग जाती है और ‘जहाँ पर आनन्द वहीं पर मैं’ ( ‘सोऽहम’ ) के भाव की प्राप्ति होती है । इसे नादयोग समाधि कहा जाता है ।

विशेष

भ्रामरी मुद्रा के अभ्यास के समय किस प्रकार की ध्वनि अथवा नाद की उत्पत्ति होती है ? उत्तर है भँवरे की ।

Reader discussion

Comments (2)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव!

    आपका बहुत बहुत आभार।

  2. Anshu

    Prnam Aacharya Ji Dhanyavad