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Gheranda Samhita

Gheranda Samhita Ch. 6 [1-8]

अध्याय 6: ध्यान

अध्याय परिचय

छटा अध्याय ( ध्यान वर्णन )

घेरण्ड संहिता के छठे अध्याय में ध्यान योग का उपदेश दिया गया है । महर्षि घेरण्ड ने ध्यान की तीन अवस्थाएँ ( स्थूल ध्यान, ज्योतिध्यान व सूक्ष्म ध्यान ) मानी हैं । ध्यान का प्रतिफल बताते हुए कहा है कि ध्यान के अभ्यास से योगी साधक को अपना स्वयं का प्रत्यक्षीकरण होता है । ध्यान को महर्षि घेरण्ड योग का छठा अंग मानते हैं ।

ध्यान के प्रकार

मूल श्लोक · 6.1

स्थूलं ज्योतिस्तथा सूक्ष्मं ध्यानस्य त्रिविधं विदुः । स्थूलं मूर्तिमयं प्रोक्तं ज्योतिस्तेजोमयं तथा । सूक्ष्मं बिन्दुमयं ब्रह्म कुण्डलीपरदेवता ।। 1 ।।

भावार्थ

ध्यान के तीन प्रकार होते हैं :- स्थूलध्यान, ज्योतिध्यान व सूक्ष्मध्यान । इनमें से स्थूल ध्यान को मूर्ति अथवा ठोस पदार्थ पर किया जाने वाला, ज्योति ध्यान को प्रकाशरूप अथवा तेजोमय पर किया जाने वाला व कुण्डलिनी से भी परे अर्थात् बिन्दुमय ब्रह्मा पर किया जाने वाला ध्यान सूक्ष्म ध्यान होता है ।

विशेष

ध्यान के कितने प्रकारों का वर्णन किया गया है ? उत्तर है तीन ( स्थूल, ज्योति व सूक्ष्म ) । किस ध्यान को मूर्ति अथवा ठोस ध्यान कहा जाता है ? उत्तर है स्थूलध्यान । तेजोमय ध्यान किस अवस्था को कहा गया है ? उत्तर है ज्योतिध्यान । कुण्डलिनी से परे या बिन्दु ध्यान किसे कहा गया है ? उत्तर है सूक्ष्मध्यान ।

स्थूल ध्यान विधि वर्णन

मूल श्लोक · 6.2

स्वकीयहृदये ध्यायेत् सुधासागरमुत्तमम् । तन्मध्ये रत्नद्वीपं तु सुरत्नं वालुकामयम् ।। 2 ।।

मूल श्लोक · 6.3

चतुर्दिक्षु निम्बतरु: बहुपुष्पसमन्वित: । निम्बो पवनसं कूलेवेष्टितं परिखा इव ।। 3 ।।

मूल श्लोक · 6.4

मालतीमल्लिकाजातीकेशरैश्चम्पकैस्तथा । पारिजातै: स्थलपद्मैर्गन्धामोदितदिङ्मुखै: ।। 4 ।।

मूल श्लोक · 6.5

तन्मध्ये संस्मरेद्योगी कल्पवृक्षं मनोहरम् । चतु: शाखाचतुर्वेदं नित्यपुष्पफलान्वितम् ।। 5 ।।

मूल श्लोक · 6.6

भ्रमरा: कोकिलास्तत्र गुञ्जन्ति निगदन्ति च । ध्यायेत्तत्र स्थिरो भूत्वा महामाणिक्यमण्डपम् ।। 6 ।।

मूल श्लोक · 6.7

तन्मध्ये तु स्मरेद्योगी पर्यङ्कं सुमनोहरम् । तत्रेष्टदेवतां ध्यायेद् यद्धयानं गुरु भाषितम् ।। 7 ।।

मूल श्लोक · 6.8

यस्य देवस्य यद्रूपं यथा भूषणवाहनम् । तद्रूपं ध्यायते नित्यं स्थूलध्यानमिदं विदुः ।। 8 ।।

भावार्थ

अपने हृदय प्रदेश में अमृत रूपी उत्तम समुद्र का ध्यान करते हुए उसके बीच ( समुद्र के ) में रत्नों से परिपूर्ण बालुकामय ( बालु रेत के ) के द्वीप अर्थात् टापू का ध्यान करना चाहिए ।

उसके चारों ओर बहुत सारे फलों से परिपूर्ण अर्थात् लदे हुए नीम के पेड़ हों और वह नीम के बाग उसके चारों ओर खाई के समान प्रतीत हो रहे हों ।

तथा मालती, मल्लिका, चमेली, केशर, चम्पा, स्थल कमल, व हारश्रृंगार के फूलों की सुगन्ध सभी दिशाओं को सुगन्धित कर रही हैं ।

इन सभी के बीच में ही योगी द्वारा एक अत्यंत मनमोहक कल्पवृक्ष का स्मरण अथवा ध्यान करे । जिसकी अनेक शाखाओं से चारों वेद रूपी ज्ञान के फल निरन्तर फलित हो ( प्रतिदिन बढ़ते हों ) रहे हों ।

वहाँ पर ( उस उद्यान या बाग में ) भँवरे व कोयल अपनी मधुर गुञ्जार ( गायन ) कर रहे हों । वहीं पर अपने चित्त को एक जगह पर स्थिर करके मणियों से परिपूर्ण मण्डप का ध्यान करना चाहिए ।

योगी को उसके बीच में मनमोहक पल का स्मरण अथवा ध्यान करना चाहिए । साथ ही गुरु ने जिस भी देवता का ध्यान करने की बात कही है, उसी का ध्यान करे ।

जिस देवता का जो भी आभूषण और वाहन बताया गया है । ठीक उसी आभूषण व वाहन का ध्यान करना स्थूल ध्यान होता है ।

विशेष

ऊपर वर्णित सभी ध्यान के तत्त्व आवश्यक हैं । विद्यार्थी इन्हें ध्यान से पढ़ें ।

Reader discussion

Comments (3)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Shankar prajapati

    धन्यवाद सर..

  2. Neelam

    Bahut sunder explanation ,thank you sir

  3. Aashish malhan

    Nice explain about dhyana dr sahab.