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Gheranda Samhita

Gheranda Samhita Ch. 7 [3-4]

अध्याय 7: समाधि

मूल श्लोक · 7.3

घटाद्भिन्नं मन: कृत्वा ऐक्यं कुर्यात् परात्मनि । समाधिं तं विजानीयान्मुक्तसंज्ञो दशादिभि: ।। 3 ।।

मूल श्लोक · 7.4

अहं ब्रह्म न चान्योऽस्मि ब्रह्मैवाहं न शोकभाक् । सच्चिदानंदरूपोऽहं नित्यमुक्त: स्वभाववान् ।। 4 ।।

भावार्थ

जब साधक अपने मन को शरीर से अलग समझकर उसका ( मन का )  परमात्मा के साथ एकीकरण कर देता है । तब वह समाधि की अवस्था कहलाती है । इस अवस्था में साधक जीवन की अनेक दशाओं ( सांसारिक अवस्थाओं ) से पूरी तरह मुक्त हो जाता है ।

इस प्रकार समाधि भाव को प्राप्त होने पर साधक में मैं ब्रह्मा हूँ, ब्रह्मा के अतिरिक्त कुछ नहीं हूँ, मुझमे ब्रह्म भाव है न की किसी प्रकार के दुःख का भाव है । मैं सदैव मुक्त स्वभाव वाला, सत् चित्त व आनन्द के स्वरूप से परिपूर्ण हूँ ।

विशेष

समाधि की अवस्था में मन का किसके साथ एकीकरण हो जाता है ? उत्तर है परमात्मा के साथ । साधक ब्रह्म भाव से कब परिपूर्ण होता है ? उत्तर है समाधि प्राप्ति के समय ।

Reader discussion

Comments (2)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. आलोक कुमार पटवा

    ओम् गुरुदेव!

    आपका परम आभार।

  2. Aashish malhan

    Nice explain about barhm feeling dr sahab.