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Gheranda Samhita

Gheranda Samhita Ch. 7 [14-15]

अध्याय 7: समाधि

भक्तियोग समाधि

मूल श्लोक · 7.14

स्वकीयहृदये ध्यायेदिष्टदेव स्वरूपकम् । चिन्तयेद् भक्तियोगेन परमाह्लादपूर्वकम् ।। 14 ।।

मूल श्लोक · 7.15

आनन्दाश्रुपुलकेन दशाभाव: प्रजायते । समाधि: सम्भवेत्तेन सम्भवेच्च मनोन्मनी ।। 15 ।।

भावार्थ

अपने हृदय प्रदेश में अपने इष्टदेव का ध्यान करें और परमानन्द के साथ भक्तियोग का चिन्तन करना चाहिए ।

जब साधक का हृदय परमानन्द के अश्रुओं से उदित हो जाता है तब उसकी भावना विशेष प्रकार के भक्तिभाव से परिपूर्ण हो जाती है । जिससे मनोन्मनी ( मन में उन्मनी भाव से ) समाधि की प्राप्ति हो जाती है ।

इसे भक्तियोग समाधि कहा जाता है ।

विशेष

भक्तियोग समाधि में साधक अपने हृदय में किसका ध्यान करता है ? उत्तर है अपने इष्टदेव का । भक्तियोग से कौन सी समाधि प्राप्त होती है ? उत्तर है मनोन्मनी समाधि ।

Reader discussion

Comments (5)

These comments have been preserved from the original Dr. Somveer Yoga website.

  1. Vinod Sharma

    अति सुन्दर ।।

  2. Mamta

    Thank you sir

  3. आलोक कुमार पटवा

    ॐ गुरुदेव!

    आपका हृदय से परम आभार।

  4. Aashish malhan

    Nice guru ji.

  5. Lata baisane

    धन्यवाद।