Shrimad Bhagwad Geeta
Shrimad Bhagwad Geeta Ch. 16 [20-22]
अध्याय 16: दैवासुरसम्पद्विभागयोग
मूल श्लोक · 16.20
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि । मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ।। 20 ।।
व्याख्या
हे कौन्तेय ! वह मूर्ख लोग मुझे प्राप्त न होकर बार- बार असुर योनियों में ही जन्म लेते रहते हैं । इस प्रकार वह मुझे न प्राप्त करके आगे और भी अधिक पाप योनियों में जन्म लेते हैं ।
नरक के तीन द्वार = काम, क्रोध और लोभ
मूल श्लोक · 16.21
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ।। 21 ।।
व्याख्या
काम, क्रोध और लोभ ये नरक के तीन द्वार हैं, जो हमारे आत्मतत्त्व को नष्ट कर देते हैं, इसलिए हमें इन तीनों का सर्वथा त्याग कर देना चाहिए ।
विशेष
- गीता के अनुसार नरक के तीन द्वार कौन- कौन से कहे गए हैं ? उत्तर है - काम, क्रोध व लोभ ।
- काम, क्रोध व लोभ क्या करते हैं ? उत्तर है - हमारे आत्मतत्त्व को नष्ट करते हैं ।
काम, क्रोध व लोभ से मुक्ति = परमगति की प्राप्ति
मूल श्लोक · 16.22
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः । आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ।। 22 ।।
व्याख्या
हे कौन्तेय ! जो भी व्यक्ति तम के इन तीन द्वारों ( काम, क्रोध व लोभ ) पर निर्भर न रहकर इनसे पूरी तरह से मुक्त हो जाता है और जो अपने लिए श्रेष्ठ व्यवहार का आचरण करने लगता है, वह परमगति को प्राप्त होता है ।
Prnam guru ji. Dhnyavad.sunder lekh