अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः । अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ।। 37 ।। कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति । अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ।। 38 ।।       व्याख्या :-  अर्जुन पूछता है- हे कृष्ण ! जिस साधक में योग के प्रति श्रद्धा तो है, लेकिन उसकी साधना में क्रियाशीलता नहीं है अर्थात् जिसका

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Bhagwad Geeta Ch. 6 [37-40]

योगभ्रष्ट अथवा योगमार्ग से विचलित पुरुष की क्या दशा होती है ?   प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः । शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ।। 41 ।। अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्‌ । एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्‌ ।। 42 ।।       व्याख्या :-  योगभ्रष्ट पुरुष पुण्य आत्माओं द्वारा भोगे जाने वाले स्वर्ग आदि

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Bhagwad Geeta Ch. 6 [41-44]

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः । अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो यात परां गतिम्‌ ।। 45 ।।     व्याख्या :-  इस प्रकार जो योगी पूर्ण रूप से प्रयत्नशील होकर अथवा पूर्ण मनोयोग से अभ्यास करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर अनेक जन्मों द्वारा बहुत सारी सिद्धियाँ प्राप्त करके, परमगति अर्थात् मोक्ष को प्राप्त कर लेता है ।  

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Bhagwad Geeta Ch. 6 [45-47]

सातवां अध्याय ( ज्ञान- विज्ञान योग ) सातवें अध्याय में योगीराज श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते हैं कि इस ब्रह्म ज्ञान को जानने के बाद कोई भी ऐसा ज्ञान शेष नहीं बचता है, जिसे जानना जरूरी हो । इस अध्याय में कुल तीस ( 30 ) श्लोकों का वर्णन किया गया है । जिसमें परब्रह्ना की

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Bhagwad Geeta Ch. 7 [1-3]

आठ प्रकार की अपरा प्रकृति   भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहङ्‍कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ।। 4 ।। अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्‌ । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्‌ ।। 5 ।।     व्याख्या :-  भगवान श्रीकृष्ण अपनी अपरा प्रकृति को बताते हुए कहते हैं – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश,

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Bhagwad Geeta Ch. 7 [4-6]

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ।। 7 ।।     व्याख्या :-  हे धनंजय ! मुझसे परे अन्य कोई भी नहीं है अर्थात् मेरे अलावा इस जगत् की उत्पत्ति का कोई अन्य आधार नहीं है । जिस प्रकार सूत्र के धागे में अनेकों मोती पिरोये होते हैं, उसी प्रकार

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Bhagwad Geeta Ch. 7 [7-11]

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्चये । मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ।। 12 ।।     व्याख्या :-  ये सात्त्विक, राजसिक व तामसिक भाव अथवा गुण हैं, इनकी उत्पत्ति का आधार भी मैं ही हूँ, लेकिन ये सब मुझसे उत्पन्न होते हैं, पर मैं उनसे रहित हूँ अर्थात् यह सभी मेरे अधिकार

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Bhagwad Geeta Ch. 7 [12-15]