एम०ए० योग, बी०ए० योग, नेट योग व क्यू०सी०आई० ( योग प्रमाणिक मण्डल ) के सम्पूर्ण पाठ्यक्रम के लिए आवश्यक पुस्तकें । योग विषय की बढ़ती हुई लोकप्रियता के चलते आज अनेक विश्विद्यालयों व महाविद्यालयों ने योग को अपने यहाँ पर पाठ्यक्रम के रूप में शुरू कर दिया है । जिनमें मुख्य रूप से योग में

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सत्त्वपुरुषयो: शुद्धिसाम्ये कैवल्यमिति ।। 55 ।।     शब्दार्थ :- सत्त्व ( बुद्धि ) पुरुषयो: ( पुरुष या जीवात्मा की ) शुद्धि ( शुद्धि ) साम्ये ( समान रूप से हो जाती है ) इति ( यह ) कैवल्य ( मोक्ष या मुक्ति होती है )     सूत्रार्थ :- जब बुद्धि और जीवात्मा की

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Yoga Sutra 3 – 55

तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम् ।। 54 ।।   शब्दार्थ :- तारकं ( स्वयं की प्रतिभा अर्थात योग्यता से उत्पन्न होने वाला ज्ञान ) सर्वविषयं ( सभी पदार्थों या तत्त्वों को जानने वाला ) सर्वथा ( सदा अर्थात भूतकाल, वर्तमान काल व भविष्य काल में ) विषयम् ( सभी विषयों को जानने वाला )

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Yoga Sutra 3 – 54

जातिलक्षणदेशैरन्यताऽवच्छेदात्तुल्योस्तत: प्रतिपत्ति: ।। 53 ।।   शब्दार्थ :- जाति ( कोई विशेष समूह ) लक्षण ( किसी व्यक्ति या समूह द्वारा किए जाने वाले क्रियाकलाप ) देशै: ( स्थान या जगह का ) अन्यताऽनवच्छेदात् ( जिसमें भेद अर्थात अन्तर न किया जा सके ऐसी ) तुल्ययो: ( एक जैसी या एक समान दिखने वाली वस्तुओं

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Yoga Sutra 3 – 53

क्षणतत्क्रमयो: संयमाद्विवेकजं ज्ञानम् ।। 52 ।।   शब्दार्थ :- क्षण ( छोटे से छोटे समय अर्थात पल  ) तत्क्रमयो: ( उसके क्रम अर्थात विभाग में ) संयमात् ( संयम करने से ) विवेकजं ( विवेक से उत्पन्न ) ज्ञानम् ( ज्ञान की उत्पत्ति होती है )      सूत्रार्थ :- छोटे से छोटे समय अर्थात

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Yoga Sutra 3 – 52

स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात् ।। 51 ।।   शब्दार्थ :- स्थानि ( उच्च स्थानों या व्यक्तियों से ) उपनिमन्त्रणे ( निमंत्रण या बुलावा मिलने पर ) सङ्ग ( आसक्ति या राग ) स्मय ( अभिमान या घमण्ड ) अकरणम् ( नहीं करना चाहिए ) पुनः ( नहीं तो दोबारा से या फिर से ) अनिष्ट (

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Yoga Sutra 3 – 51

तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम् ।। 50 ।।   शब्दार्थ :- तद् ( तब उस सिद्धि अर्थात विशोका नामक सिद्धि से ) अपि ( भी )  वैराग्यात् ( वैराग्य हो जाने पर ) दोष ( दोष या अविद्या आदि क्लेशों के ) बीज ( बीजों का ) क्षये ( नाश होने से ) कैवल्य ( मोक्ष की

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Yoga Sutra 3 – 50